सादगी ही आत्मा का सबसे सुंदर श्रृंगार है
सादगी ही आत्मा का सबसे सुंदर श्रृंगार है जब आचार्य निखिल जी महाराज यह कहते हैं— “जो सादगी को श्रृंगार बना ले, वो किसी आईने का मोहताज नहीं!” तब वे केवल बाहरी सादगी की प्रशंसा नहीं कर रहे होते, बल्कि मनुष्य के आंतरिक सौंदर्य की ओर उसका ध्यान आकर्षित कर रहे होते हैं। उनका यह कथन उस जीवन-दृष्टि का उद्घोष है, जहाँ व्यक्तित्व का मूल्य वस्त्रों, आभूषणों, पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, विनम्रता और सहजता से आँका जाता है। गुरुजी का यह संदेश हमें बताता है कि जिस व्यक्ति की आत्मा निर्मल हो जाती है, उसके व्यक्तित्व को सुंदर दिखाने के लिए किसी कृत्रिम आभूषण की आवश्यकता नहीं रहती। उस समय आचार्य निखिल जी की मनःस्थिति अत्यंत शांत, आत्मानुभूति से परिपूर्ण और करुणामयी प्रतीत होती है। वे ऐसे समाज को देख रहे होते हैं जो बाहरी आकर्षण को ही सुंदरता मान बैठा है। लोग चेहरे को संवारने में घंटों लगा देते हैं, किंतु मन को सजाने का समय नहीं निकालते। वे यह अनुभव कर रहे होते हैं कि आईने केवल चेहरा दिखा सकते हैं, चरित्र नहीं; वस्त्र केवल शरीर को सजा सकते हैं, आत्मा को नहीं। इसलिए वे मनुष्य को भीतर क...