किरदार की शुद्धता ही जीवन की सबसे बड़ी साधना
किरदार की शुद्धता ही जीवन की सबसे बड़ी साधना “तू ‘परवाह’ न कर, ‘तमाशे’ तो होते रहेंगे ताउम्र; तू बस यह ‘ख़याल’ रख कि तेरा किरदार ‘बेदाग’ रहे।” यह कथन आचार्य निखिल की उस गहन जीवन-दृष्टि से उपजा हुआ प्रतीत होता है, जहाँ उन्होंने संसार को उसके यथार्थ रूप में स्वीकार किया है। ऐसा कहते समय उनकी मनःस्थिति किसी निराशा की नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता की रही होगी। वे भलीभाँति जानते हैं कि समाज मंच है, लोग दर्शक भी हैं और अभिनेता भी, और तमाशे जीवन का स्थायी सत्य हैं। प्रश्न यह नहीं कि तमाशे होंगे या नहीं, प्रश्न यह है कि उनके बीच मनुष्य स्वयं को कैसे निभाता है। गुरुजी प्रवचन के स्वर में समझाते हैं कि जब हम दूसरों की बातों, आरोपों, अफ़वाहों और प्रतिक्रियाओं को अपने मन पर हावी होने देते हैं, तब हम अपने किरदार से भटकने लगते हैं। तमाशे अक्सर हमारे नियंत्रण में नहीं होते, पर हमारा आचरण, हमारी नीयत और हमारा विवेक सदा हमारे हाथ में रहते हैं। जो व्यक्ति हर दृश्य पर प्रतिक्रिया देने लगता है, वह धीरे-धीरे स्वयं दृश्य का हिस्सा बन जाता है; और जो अपने किरदार पर टिके रहता है, वही अंत में स्मरणीय होता है।...