“पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है”
“पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है” जब आचार्य निखिल यह कहते हैं— “उत्तम मनुष्य वही जो भाग्य का नहीं, बल्कि सर्वदा प्रयत्न और पुरुषार्थ का ही आलंबन ले।” तब वे केवल परिश्रम का महत्व नहीं बता रहे होते, बल्कि मनुष्य को उसकी सुप्त शक्ति का बोध करा रहे होते हैं। उनका यह कथन भाग्य का निषेध नहीं करता, बल्कि भाग्यवाद का निषेध करता है। वे यह समझाना चाहते हैं कि भाग्य प्रतीक्षा करने वालों का सहारा हो सकता है, किंतु इतिहास रचने वालों का आधार सदैव पुरुषार्थ ही होता है। उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत ओजस्वी, प्रेरणादायी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतीत होती है। वे ऐसे मनुष्य को देख रहे होते हैं जो अपनी असफलताओं का कारण ग्रहों, परिस्थितियों और भाग्य को मानकर स्वयं को कर्म से विमुख कर लेता है। गुरुजी का हृदय ऐसी मानसिकता को देखकर व्यथित भी होता है और करुणा से भर भी उठता है। वे मनुष्य को उसकी वास्तविक सामर्थ्य का स्मरण कराना चाहते हैं। उनकी वाणी में एक गुरु का स्नेह भी है और एक योद्धा का आह्वान भी। मानो वे अपने शिष्यों से कह रहे हों— “भाग्य तुम्हारे हाथों की रेखाओं में नही...