क्रोध: आत्मविनाश का अदृश्य जाल
क्रोध: आत्मविनाश का अदृश्य जाल जब आचार्य जी कहते हैं कि “क्रोध एक ऐसा हुनर है, जिसमें फंसते भी आप हैं, उलझते भी आप हैं, पछताते भी आप हैं और तो और पिछड़ते भी आप ही हैं।” यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के गहन अनुभवों से उपजा हुआ एक चेतावनी संदेश है। यह कथन उस मनःस्थिति से निकला प्रतीत होता है जहाँ एक साधक ने मनुष्य के भीतर उठते भावों का सूक्ष्म अवलोकन किया है, और यह देखा है कि क्रोध कोई बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि भीतर पलने वाला ऐसा तत्त्व है जो धीरे-धीरे व्यक्ति को स्वयं से ही दूर कर देता है। गुरु जी की दृष्टि में क्रोध कोई साधारण प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक ऐसा भ्रम है जो हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम किसी और को दंडित कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हम स्वयं को ही आघात पहुँचा रहे होते हैं। जब मन अपेक्षाओं से भर जाता है और परिस्थितियाँ उन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होतीं, तब भीतर एक असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष जब नियंत्रण से बाहर होता है, तो वह क्रोध का रूप ले लेता है। उस क्षण व्यक्ति स्वयं को सही और सामने वाले को गलत मानने लगता है, परंतु यही वह क्षण होता है जह...