मेरे गुरु ने क्या खूब कहा
मेरे गुरु ने क्या खूब कहा “मैं जीतने आया ही नहीं, मैं तो जीने आया हूँ…” भूमिका कभी-कभी गुरु का एक वाक्य हमारे भीतर इतनी गहराई तक उतर जाता है कि वर्षों से जमा हुई शिकायतें, अपेक्षाएँ और दूसरों की नादानियाँ छोटी लगने लगती हैं। मन कहता है—जिस बात को लेकर मैं इतना परेशान था, वह तो जीवन की राह का एक छोटा-सा पड़ाव भर थी। आचार्य निखिल जी का यह वाक्य भी ऐसा ही है— “मैं जीतने आया ही नहीं, मैं तो जीने आया हूँ… ये दौड़ तुमको मुबारक, मैं खुद को पाने आया हूँ!” आइए, आज इसी बात को बहुत सरल ढंग से समझते हैं। प्रवचन मेरे प्रिय साथियो! हम सब जीवन में कुछ न कुछ जीतना चाहते हैं। कोई परीक्षा जीतना चाहता है, कोई नौकरी, कोई व्यापार, कोई प्रतिष्ठा। कोई चाहता है कि उसका घर दूसरों से बड़ा हो, उसकी गाड़ी बेहतर हो, उसके बच्चे सबसे आगे हों। कोई चाहता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें और उसे सबसे सफल व्यक्ति मानें। जीतना बुरा नहीं है। लेकिन एक सवाल जरूर पूछिए— जीतते-जीतते हम कहीं अपना जीवन तो नहीं हार रहे? हम सुबह उठते हैं और दौड़ना शुरू कर देते हैं। किससे आगे निकलना है, यह पता होता है; लेकिन कहाँ पहुँचना है, यह कई...