मेरे गुरु ने क्या खूब कहा

 

मेरे गुरु ने क्या खूब कहा

“मैं जीतने आया ही नहीं, मैं तो जीने आया हूँ…”

भूमिका

कभी-कभी गुरु का एक वाक्य हमारे भीतर इतनी गहराई तक उतर जाता है कि वर्षों से जमा हुई शिकायतें, अपेक्षाएँ और दूसरों की नादानियाँ छोटी लगने लगती हैं। मन कहता है—जिस बात को लेकर मैं इतना परेशान था, वह तो जीवन की राह का एक छोटा-सा पड़ाव भर थी।

आचार्य निखिल जी का यह वाक्य भी ऐसा ही है—

“मैं जीतने आया ही नहीं, मैं तो जीने आया हूँ…
ये दौड़ तुमको मुबारक, मैं खुद को पाने आया हूँ!”

आइए, आज इसी बात को बहुत सरल ढंग से समझते हैं।

प्रवचन

मेरे प्रिय साथियो!

हम सब जीवन में कुछ न कुछ जीतना चाहते हैं।

कोई परीक्षा जीतना चाहता है, कोई नौकरी, कोई व्यापार, कोई प्रतिष्ठा। कोई चाहता है कि उसका घर दूसरों से बड़ा हो, उसकी गाड़ी बेहतर हो, उसके बच्चे सबसे आगे हों। कोई चाहता है कि लोग उसकी प्रशंसा करें और उसे सबसे सफल व्यक्ति मानें।

जीतना बुरा नहीं है।

लेकिन एक सवाल जरूर पूछिए—
जीतते-जीतते हम कहीं अपना जीवन तो नहीं हार रहे?

हम सुबह उठते हैं और दौड़ना शुरू कर देते हैं।
किससे आगे निकलना है, यह पता होता है;
लेकिन कहाँ पहुँचना है, यह कई बार पता नहीं होता।

हम दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी को छोटा समझने लगते हैं।

वह मुझसे आगे क्यों है?
उसके पास मुझसे ज्यादा क्यों है?
उसकी प्रशंसा मुझसे ज्यादा क्यों होती है?
उसका घर, उसका व्यवसाय, उसकी सफलता मुझसे बड़ी क्यों है?

और फिर शुरू होती है एक ऐसी दौड़ जिसका कोई अंतिम पड़ाव नहीं।

एक मंजिल मिलती है तो दूसरी सामने आ जाती है।
दूसरी मिलती है तो तीसरी बुलाने लगती है।

मन कहता है—बस यह मिल जाए, फिर चैन से जीऊँगा।

लेकिन वह “फिर” कभी आता ही नहीं।

तो क्या सफलता छोड़ दें?

नहीं।

गुरु का संदेश यह नहीं है कि मेहनत मत करो, आगे मत बढ़ो, सफलता मत पाओ।

सफलता पाओ।
अपने सपने पूरे करो।
ईमानदारी से मेहनत करो।
अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करो।

लेकिन इतना जरूर ध्यान रखना—

तुम्हारी सफलता तुम्हारे जीवन को सुंदर बनाए,
तुम्हारा जीवन तुम्हारी सफलता का बोझ न बन जाए।

धन कमाते-कमाते यदि मुस्कुराना भूल गए, तो सोचिए।

प्रतिष्ठा बनाते-बनाते यदि अपने लोगों से दूर हो गए, तो सोचिए।

दूसरों को पीछे छोड़ते-छोड़ते यदि अपने बच्चों का बचपन, माता-पिता का साथ और मित्रों की हँसी पीछे छूट गई, तो एक बार रुककर जरूर सोचिए—

आखिर मैं जीत किस कीमत पर रहा हूँ?

एक छोटी-सी बात समझिए

मान लीजिए एक व्यक्ति ने जीवन भर बहुत मेहनत की। उसने धन कमाया, बड़ा घर बनाया, खूब प्रतिष्ठा पाई।

उम्र बढ़ी।

एक दिन वह अपने बड़े-से घर की खिड़की के पास बैठा था।

घर में सब कुछ था—सुविधाएँ थीं, संपत्ति थी, सम्मान था।

लेकिन एक कमी थी।

उसके पास बैठकर हँसने वाला कोई नहीं था।

बच्चे अपने जीवन में दूर जा चुके थे। पुराने मित्र छूट चुके थे। जिन लोगों को पीछे छोड़कर वह आगे बढ़ा था, उनसे संबंध भी समाप्त हो चुके थे।

तब उसने अपने पुराने मित्र से कहा—

“मैं जीवन भर जीतता रहा, लेकिन पता ही नहीं चला कि कब जीना भूल गया।”

साथियो!

यहीं गुरु की बात समझ में आती है—

यदि आपकी जीत आपको जीवन से दूर कर दे, तो वह विजय नहीं है।
वह केवल पराजय का सुंदर नाम है।

जीवन नदी की तरह है

एक छोटी-सी धारा पहाड़ से निकली।

उसने देखा कि एक बड़ी नदी बहुत तेजी से समुद्र की ओर बढ़ रही है।

धारा ने पूछा—

“बहन, इतनी जल्दी क्यों?”

नदी ने कहा—

“मुझे सबसे पहले समुद्र तक पहुँचना है।”

छोटी धारा मुस्कुराई।

उसने कहा—

“मुझे सबसे पहले नहीं पहुँचना।
मैं रास्ते में खेतों को सींचूँगी, किसी की प्यास बुझाऊँगी, किनारों को जीवन दूँगी और फिर समुद्र तक पहुँचूँगी।”

देखिए, दोनों का लक्ष्य समुद्र ही था।

फर्क केवल इतना था कि एक को पहुँचने की जल्दी थी, और दूसरी को जीने की समझ।

हमारे जीवन में भी यही अंतर है।

हम मंजिल तक पहुँचने की इतनी जल्दी में रहते हैं कि रास्ते में मिलने वाले जीवन को देखना ही भूल जाते हैं।

बच्चा मुस्कुराता है—हमारे पास समय नहीं।

माँ बुलाती है—हम व्यस्त हैं।

मित्र मिलना चाहता है—हम कहते हैं, अभी काम है।

प्रकृति बुलाती है—हम मोबाइल में व्यस्त हैं।

और फिर एक दिन समय हमारे पास होता है, लेकिन वे लोग और वे पल हमारे पास नहीं होते।

इसलिए गुरु कहते हैं—“खुद को पाने आया हूँ”

अब इस वाक्य का सबसे सुंदर हिस्सा है—

“मैं खुद को पाने आया हूँ।”

खुद को पाना मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं।

खुद को पाना मतलब अपने भीतर लौटना।

मैं वास्तव में चाहता क्या हूँ?

मेरी खुशी किसमें है?

मैं किसके लिए जी रहा हूँ?

क्या जो कुछ मैं कर रहा हूँ, वह मेरी इच्छा है या केवल लोगों को दिखाने के लिए कर रहा हूँ?

क्या मेरी उपलब्धियाँ मुझे भीतर से शांत कर रही हैं?

क्या मेरे संबंध मेरे साथ हैं?

क्या मैं स्वयं के साथ सहज हूँ?

इन सवालों के उत्तर खोज लेना ही धीरे-धीरे स्वयं को पाना है।

तुलना छोड़िए

साथियो!

दूसरे की जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी का फैसला मत कीजिए।

किसी की मंजिल देखकर अपनी यात्रा को असफल मत मानिए।

हो सकता है जिसे आप बहुत सफल समझ रहे हैं, वह भीतर से बहुत अकेला हो।

और जिसे आप पीछे समझ रहे हैं, हो सकता है वह अपने जीवन से कहीं अधिक संतुष्ट हो।

हर व्यक्ति की यात्रा अलग है।

किसी का समय पहले आता है, किसी का बाद में।

फूल भी अलग-अलग मौसम में खिलते हैं।

तो फिर मनुष्य क्यों चाहता है कि हर किसी का जीवन एक ही समय पर, एक ही तरह से खिले?

आपकी तुलना केवल कल वाले अपने आप से होनी चाहिए।

क्या मैं आज कल से थोड़ा बेहतर हूँ?

क्या आज मेरे भीतर थोड़ा अधिक धैर्य है?

क्या आज मैं थोड़ा कम क्रोधित हूँ?

क्या आज मैं किसी को थोड़ा अधिक समझ पा रहा हूँ?

क्या आज मैं किसी के काम आ सका?

यदि हाँ, तो आप आगे बढ़ रहे हैं।

किसी की सफलता आपकी असफलता नहीं है

यह बात बहुत गहराई से समझ लेना।

किसी का आगे निकल जाना इस बात का प्रमाण नहीं कि आप पीछे रह गए।

किसी की प्रशंसा आपका अपमान नहीं है।

किसी की उपलब्धि आपकी हार नहीं है।

और किसी का सुख आपके दुख का कारण नहीं होना चाहिए।

जब दूसरे की सफलता देखकर मन में जलन पैदा हो, तो स्वयं से पूछिए—

“मुझे वास्तव में उससे समस्या है या अपनी अधूरी इच्छाओं से?”

यह प्रश्न बहुत कुछ बदल सकता है।

तो फिर जीवन का उद्देश्य क्या है?

मेरे प्रिय साथियो!

जीवन का उद्देश्य केवल यह नहीं कि लोग हमारे जाने के बाद कहें—

“बहुत सफल व्यक्ति था।”

एक दिन ऐसा भी आए कि हम स्वयं अपने भीतर देखकर कह सकें—

“मैंने जीवन को केवल बिताया नहीं, जिया है।”

मैंने प्रेम किया।

मैंने संबंध निभाए।

मैंने क्षमा करना सीखा।

मैंने अपनी गलतियों से सीखा।

मैंने किसी के आँसू पोंछे।

मैं किसी के चेहरे की मुस्कान का कारण बना।

मैंने अपने हिस्से का काम ईमानदारी से किया।

और सबसे बड़ी बात—

मैंने अपने जीवन को किसी और की नकल बनाकर नहीं जिया।

यही तो है—खुद को पाना।

इसलिए यदि दुनिया दौड़ना चाहती है, तो उसे दौड़ने दीजिए।

आप भी मेहनत कीजिए, आगे बढ़िए, अपने लक्ष्य प्राप्त कीजिए।

लेकिन बीच-बीच में रुककर अपने आप से पूछते रहिए—

“मैं कहाँ जा रहा हूँ?”
“क्यों जा रहा हूँ?”
“और इस यात्रा में क्या खो रहा हूँ?”

क्योंकि जीवन केवल मंजिल का नाम नहीं है।

जीवन उस रास्ते का नाम भी है जिस पर चलते हुए हम स्वयं को पहचानते हैं।

और शायद इसी एहसास से गुरु का वह वाक्य जन्म लेता है—

“मैं जीतने आया ही नहीं,
मैं तो जीने आया हूँ।
ये दौड़ तुमको मुबारक,
मैं खुद को पाने आया हूँ।”

याद रखिए—

दुनिया आपको विजेता कहे या न कहे,
यदि आपका मन शांत है,
आपके संबंध जीवित हैं,
आपका अंतर्मन प्रसन्न है
और रात को सोते समय आपको अपने जीवन से शिकायत कम और संतोष अधिक है—

तो समझिए, आपने जीवन की सबसे बड़ी जीत हासिल कर ली है।

क्योंकि अंततः—

दूसरों को हराना जीत नहीं है।
अपने भीतर लौट आना ही वास्तविक विजय है।

आचार्य निखिल जी के संदेश से प्रेरित


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