“बेसब्री से बेकद्री तक का सफर — मनुष्य की फितरत का दर्पण”
“बेसब्री से बेकद्री तक का सफर — मानव फितरत का दर्पण”
जब आचार्य निखिल यह कहते हैं—
“मिलने से पहले 'बेसब्री' और मिलने के बाद 'बेकद्री'। इंसान की फितरत ही उसके चरित्र की परिचायक होती है...!”
तब वे केवल मानवीय संबंधों की विडम्बना का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि मनुष्य की उस मनोवृत्ति का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहे होते हैं, जिसमें प्राप्त वस्तु का मूल्य धीरे-धीरे कम होने लगता है और अप्राप्त वस्तु अत्यधिक आकर्षक प्रतीत होती है। उनका यह कथन संबंधों की आलोचना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके अपने स्वभाव से परिचित कराने का एक आत्मदर्शी प्रयास है।
उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत गंभीर, अनुभवी और करुणामयी प्रतीत होती है। वे जीवन के अनगिनत संबंधों को देखकर यह अनुभव कर रहे होते हैं कि मनुष्य किसी व्यक्ति, वस्तु या अवसर को पाने के लिए तो अत्यंत उत्सुक रहता है, परंतु उसे प्राप्त होते ही उसका सम्मान और महत्त्व कम करने लगता है। यह परिवर्तन सामने वाले व्यक्ति में नहीं आता, बल्कि देखने वाले की दृष्टि में आता है। इसलिए गुरुजी का संकेत किसी दूसरे की ओर नहीं, बल्कि हमारे भीतर बैठे उस असंतोष की ओर है, जो प्राप्त को साधारण और अप्राप्त को असाधारण बना देता है।
मानो गुरुजी अपने शिष्यों से कह रहे हों— “जिस प्रेम के लिए तुमने प्रार्थनाएँ की थीं, क्या उसे पाकर भी उतना ही सम्मान दिया? जिन माता-पिता के सान्निध्य में तुम बड़े हुए, क्या उनके रहते उनकी उपस्थिति का मूल्य समझा? जिस अवसर के लिए तुमने वर्षों प्रतीक्षा की, क्या उसे पाकर उसी श्रद्धा से निभाया? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो समस्या संबंधों में नहीं, फितरत में है।”
वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक युवक वर्षों तक एक दुर्लभ वीणा खरीदने का स्वप्न देखता रहा। उसने कठिन परिश्रम से धन एकत्र किया और अंततः वह वीणा उसके घर आ गई। प्रारंभिक दिनों में वह प्रतिदिन उसे बड़े प्रेम से साफ करता, श्रद्धा से बजाता और उसकी प्रशंसा करता। कुछ महीनों बाद वही वीणा कमरे के एक कोने में धूल खाने लगी। एक दिन उसके वृद्ध गुरु ने पूछा— “क्या वीणा बदल गई?” युवक बोला— “नहीं।” गुरु मुस्कुराए— “फिर बदला कौन?” युवक मौन हो गया। गुरुजी कहते हैं— “वस्तु नहीं बदली थी, केवल मन की कृतज्ञता कम हो गई थी। जहाँ कृतज्ञता समाप्त होती है, वहीं बेकद्री प्रारंभ हो जाती है।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक गाँव में दो मित्र रहते थे। एक मित्र नगर चला गया और दूसरा गाँव में ही रहा। नगर जाने वाला मित्र वर्षों तक अपने पुराने साथी से मिलने के लिए व्याकुल रहता था। जब वर्षों बाद दोनों साथ रहने लगे, तो धीरे-धीरे उसने उसी मित्र की छोटी-छोटी बातों में दोष निकालने शुरू कर दिए। एक दिन गाँव वाला मित्र बोला— “जब मैं दूर था, तब तुम्हें मेरी हर बात अच्छी लगती थी; आज मैं पास हूँ, तो मेरी हर बात खटकने लगी।” यह सुनकर नगर वाला मित्र भीतर तक हिल गया। गुरुजी समझाते हैं— “दूरी ने प्रेम को नहीं बढ़ाया था, अभाव ने मूल्य का एहसास कराया था। निकटता ने प्रेम को नहीं घटाया, बल्कि मन की असावधानी ने सम्मान को कम कर दिया।”
आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस गहरे सत्य से प्रकाशित होती है कि चरित्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि हम अप्राप्त वस्तु की कितनी इच्छा करते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि प्राप्त वस्तु, व्यक्ति और संबंधों का कितना सम्मान करते हैं। जो व्यक्ति मिलने से पहले जितना विनम्र और मिलने के बाद भी उतना ही कृतज्ञ बना रहता है, वही वास्तव में चरित्रवान है।
उनकी वाणी में करुणा इसलिए है कि वे जानते हैं— यह दोष केवल कुछ लोगों का नहीं, बल्कि मनुष्य के चंचल मन का स्वभाव है। मन हर समय नए आकर्षण खोजता है और जो उसके पास है, उसकी महत्ता भूल जाता है। इसलिए वे मनुष्य को दोष नहीं देते, बल्कि उसे सजग करते हैं कि वह अपने भीतर कृतज्ञता का दीपक जलाए रखे।
वे आगे मानो यह भी कह रहे हों— “किसी व्यक्ति का मूल्य उसके चले जाने के बाद मत समझो। किसी संबंध का सम्मान उसके टूटने के बाद मत करो। जो आज तुम्हारे पास है, वही कल स्मृति बन सकता है। इसलिए वर्तमान की उपेक्षा करके भविष्य में पछताना बुद्धिमानी नहीं है।”
अंततः आचार्य निखिल का यह संदेश केवल संबंधों के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन के लिए है। वे मानो कह रहे हों— “जिस दिन तुम अपने पास मौजूद लोगों, अवसरों और ईश्वर के उपहारों के प्रति कृतज्ञ होना सीख जाओगे, उसी दिन ‘बेसब्री’ का स्थान संतोष ले लेगा और ‘बेकद्री’ का स्थान सम्मान। क्योंकि इंसान की फितरत ही उसके चरित्र का सबसे सच्चा परिचय देती है। यदि फितरत में कृतज्ञता, संवेदनशीलता और सम्मान है, तो संबंध लंबे समय तक मधुर बने रहते हैं। किंतु यदि फितरत में केवल पाने की लालसा और पाने के बाद उपेक्षा है, तो संसार का कोई भी संबंध स्थायी सुख नहीं दे सकता। इसलिए अपने स्वभाव को ऐसा बनाइए कि मिलने से पहले जितना प्रेम हो, मिलने के बाद उससे कहीं अधिक सम्मान और आदर बना रहे। यही सच्चे चरित्र की पहचान है, और यही जीवन की वास्तविक साधना भी।”
वक्ता
आचार्य निखिल जी महाराज
सहारनपुर
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति









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