“समय का निर्णय बनने से पहले स्वयं निर्णय लेना सीखो”
“समय का निर्णय बनने से पहले स्वयं निर्णय लेना सीखो”
जब आचार्य निखिल जी महाराज यह कहते हैं—
“समय वह अप्रतिम कठोर शिक्षक है जो पहले इम्तिहान लेता है, फिर शिक्षा देता है।”
और! आगे जोड़ते हैं—
“अतः समय न लगाओ तय करने में कि आपको क्या करना है;
वरना समय स्वयं तय कर देगा कि आपका क्या करना है।”
तब वे केवल समय के महत्व का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि जीवन के उस अटल नियम का उद्घाटन कर रहे होते हैं, जिसे न कोई बदल सकता है और न टाल सकता है। उनका यह कथन मनुष्य को चेतावनी भी देता है और प्रेरणा भी। यह बताता है कि जो व्यक्ति समय रहते अपने निर्णय नहीं लेता, उसके निर्णय परिस्थितियाँ लेने लगती हैं।
उस समय आचार्य निखिल जी की मनःस्थिति अत्यंत जागृत, दूरदर्शी और करुणामयी प्रतीत होती है। वे उन असंख्य लोगों को देख रहे होते हैं जो जीवन भर सोचते रहते हैं— “एक दिन यह करूँगा... एक दिन बदल जाऊँगा... एक दिन साधना करूँगा... एक दिन अपने सपनों को पूरा करूँगा...” और इसी “एक दिन” की प्रतीक्षा करते-करते पूरा जीवन बीत जाता है। गुरुजी अनुभव कर चुके हैं कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। वह न किसी की इच्छाओं से प्रभावित होता है, न किसी के बहानों से। इसलिए वे प्रेमपूर्वक मनुष्य को झकझोरते हैं कि निर्णय लेने में विलंब मत करो, क्योंकि समय का प्रवाह किसी के लिए रुकता नहीं।
मानो वे अपने शिष्यों से कह रहे हों— “समय तुम्हारा मित्र भी है और गुरु भी। यदि तुम समय के साथ चलोगे, तो वह तुम्हें ऊँचाइयों तक पहुँचा देगा; लेकिन यदि तुम आलस्य, संशय और टालमटोल में उलझे रहोगे, तो वही समय तुम्हें कठोर अनुभवों के माध्यम से सिखाएगा। अंतर केवल इतना है कि पहली शिक्षा प्रेम से मिलती है और दूसरी पीड़ा से।”
वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक युवा किसान को अपने पिता ने कहा— “इस वर्ष वर्षा आने से पहले खेत तैयार कर लो।” युवक हर दिन सोचता रहा— “अभी बहुत समय है।” कभी मित्रों के साथ चला गया, कभी आराम करता रहा, कभी योजनाएँ बनाता रहा। देखते-ही-देखते वर्षा आ गई। खेत तैयार नहीं था। वर्षा का जल बह गया, बीज नहीं बोए जा सके और पूरा वर्ष कठिनाई में बीता। अगले वर्ष उसने बिना विलंब किए समय पर खेत तैयार कर लिया। उस वर्ष भरपूर फसल हुई। गुरुजी मुस्कुराकर कहते हैं— “समय ने पहले परीक्षा ली, फिर शिक्षा दी। किंतु वह शिक्षा बहुत महँगी पड़ी।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक गुरु ने अपने दो शिष्यों को एक-एक दीपक दिया और कहा— “रात्रि होने से पहले पर्वत की चोटी पर पहुँचना।” पहला शिष्य तुरंत चल पड़ा। दूसरा सोचता रहा— “अभी सूर्य अस्त नहीं हुआ है, थोड़ी देर बाद निकलूँगा।” जब वह चला, तब तक अंधेरा हो चुका था। रास्ता कठिन था, दीपक हवा से बुझ गया और वह बीच मार्ग में ही भटक गया। सुबह वह किसी प्रकार आश्रम लौटा। गुरु ने कहा— “तुम रास्ता नहीं हारे, तुम समय हार गए।” आचार्य निखिल समझाते हैं— “जो समय पर पहला कदम उठा लेता है, मंज़िल उसी के लिए सरल हो जाती है।”
आचार्य निखिल जी की चेतना उस समय इस गहरे अनुभव से प्रकाशित होती है कि जीवन में सबसे बड़ी हानि धन की नहीं, समय की होती है। खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, खोया हुआ सम्मान भी लौट सकता है, किंतु बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। वे चाहते हैं कि मनुष्य यह समझे कि हर क्षण एक अवसर है, और हर अवसर के साथ एक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है।
उनकी वाणी में करुणा इसलिए है कि वे जानते हैं— मनुष्य को रोकने वाली सबसे बड़ी बाधा परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसका संशय और टालमटोल है। वह निर्णय लेने से डरता है, असफलता से डरता है, परिवर्तन से डरता है। और इसी डर में समय निकल जाता है। गुरुजी कहते प्रतीत होते हैं— “गलत निर्णय से भी सीख मिल जाती है, लेकिन निर्णय न लेने से केवल पछतावा मिलता है।”
वे आगे मानो यह भी कह रहे हों— “समय कभी क्रूर नहीं होता, वह केवल निष्पक्ष होता है। जो उसका सम्मान करता है, समय उसका निर्माण करता है। जो उसका अपमान करता है, समय उसे अनुभवों की अग्नि में तपाकर परिपक्व बनाता है। इसलिए समय को दोष मत दो; स्वयं को समय के योग्य बनाओ।”
अंततः आचार्य निखिल जी महाराज का यह संदेश केवल समय-प्रबंधन का नहीं, बल्कि जीवन-प्रबंधन का संदेश है। वे मानो कह रहे हों— “अपने निर्णयों को कल पर मत टालो। जो सत्य समझ में आ गया है, उसे आज ही जीवन में उतारो। जो कर्तव्य सामने है, उसे अभी पूर्ण करो। जो परिवर्तन आवश्यक है, उसे इसी क्षण स्वीकार करो। क्योंकि समय पहले अवसर देता है, फिर परीक्षा लेता है, और यदि तब भी मनुष्य नहीं जागता, तो वही समय उसका भविष्य लिख देता है। इसलिए समय के निर्णय का पात्र मत बनो; समय से पहले अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेना सीखो। यही जागरूकता है, यही पुरुषार्थ है और यही सफल जीवन का प्रथम सूत्र है।”
वक्ता, पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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