किरदार की शुद्धता ही जीवन की सबसे बड़ी साधना

 किरदार की शुद्धता ही जीवन की सबसे बड़ी साधना

“तू ‘परवाह’ न कर, ‘तमाशे’ तो होते रहेंगे ताउम्र; तू बस यह ‘ख़याल’ रख कि तेरा किरदार ‘बेदाग’ रहे।”

यह कथन आचार्य निखिल की उस गहन जीवन-दृष्टि से उपजा हुआ प्रतीत होता है, जहाँ उन्होंने संसार को उसके यथार्थ रूप में स्वीकार किया है। ऐसा कहते समय उनकी मनःस्थिति किसी निराशा की नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता की रही होगी। वे भलीभाँति जानते हैं कि समाज मंच है, लोग दर्शक भी हैं और अभिनेता भी, और तमाशे जीवन का स्थायी सत्य हैं। प्रश्न यह नहीं कि तमाशे होंगे या नहीं, प्रश्न यह है कि उनके बीच मनुष्य स्वयं को कैसे निभाता है।

गुरुजी प्रवचन के स्वर में समझाते हैं कि जब हम दूसरों की बातों, आरोपों, अफ़वाहों और प्रतिक्रियाओं को अपने मन पर हावी होने देते हैं, तब हम अपने किरदार से भटकने लगते हैं। तमाशे अक्सर हमारे नियंत्रण में नहीं होते, पर हमारा आचरण, हमारी नीयत और हमारा विवेक सदा हमारे हाथ में रहते हैं। जो व्यक्ति हर दृश्य पर प्रतिक्रिया देने लगता है, वह धीरे-धीरे स्वयं दृश्य का हिस्सा बन जाता है; और जो अपने किरदार पर टिके रहता है, वही अंत में स्मरणीय होता है।

गुरुजी एक दृष्टांत सुनाते हैं—एक नाटक में एक पात्र को बार-बार मंच पर अपमानित किया जाता था। दर्शक हँसते थे, आलोचना करते थे, पर वह पात्र हर बार अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाता रहा। नाटक समाप्त होने पर तालियाँ उसी के लिए बजीं, क्योंकि उसने परिस्थितियों के अनुसार नहीं, अपने चरित्र के अनुसार अभिनय किया था। जीवन भी ऐसा ही नाटक है; यहाँ तालियाँ देर से मिलती हैं, पर मिलती उसी को हैं जिसका किरदार साफ़ होता है।

एक और उदाहरण देते हुए गुरुजी कहते हैं—एक नदी के किनारे लोग कूड़ा फेंकते हैं, शोर मचाते हैं, पर नदी न किसी से उलझती है, न अपनी धारा रोकती है। वह बहती रहती है, निर्मल रहने का प्रयास करती है। नदी को तमाशों से फ़ुर्सत नहीं, उसे अपने प्रवाह की चिंता है। मनुष्य भी जब अपने भीतर के प्रवाह—सत्य, मर्यादा और करुणा—से जुड़ा रहता है, तब बाहरी तमाशे उसे दूषित नहीं कर पाते।

गुरुजी अंत में शांत भाव से कहते हैं कि जीवन में सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि लोग हमारे बारे में क्या कहते हैं, बल्कि यह है कि हम अपने अंतर्मन के सामने कितने निर्दोष हैं। तमाशे आएँगे, जाएँगे, लोग बदलेंगे, दृश्य बदलेंगे—पर यदि किरदार बेदाग रहा, तो आत्मा निश्चिंत रहेगी। और यही निश्चिंतता मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

सूचना स्रोत 

 
                 आचार्य निखिल जी महाराज 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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