संस्कार - आचार्य निखिल जी महाराज
“हमारे संस्कार ही वह वसीयत हैं जो इस बात के द्योतक हैं कि हमारे पूर्वजों ने हमें क्या दिया है।”
यह कथन आचार्य निखिल की उस गहन अनुभूति से उपजा हुआ प्रतीत होता है, जहाँ वे विरासत को केवल संपत्ति, नाम या वैभव तक सीमित नहीं देखते, बल्कि उसे मनुष्य के आचरण, सोच और संवेदनाओं में खोजते हैं। ऐसा कहते समय उनकी मनःस्थिति किसी आलोचक की नहीं, बल्कि एक कृतज्ञ साक्षी की रही होगी, जो वर्तमान को देखकर अतीत को पहचान पा रहा है।
गुरुजी प्रवचन के प्रवाह में समझाते हैं कि धन, भूमि या भवन समय के साथ नष्ट हो सकते हैं, पर संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। वे हमें बताते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में हम कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, दूसरों के दुःख में कैसे खड़े होते हैं और सफलता मिलने पर कितने विनम्र रह पाते हैं। यही वे मौन हस्ताक्षर हैं, जो हमारे पूर्वजों ने हमारे व्यक्तित्व पर अंकित किए हैं।
गुरुजी एक दृष्टांत सुनाते हैं—दो भाइयों को पिता से समान संपत्ति मिली। एक ने उसे भोग में गँवा दिया, दूसरा जीवनभर ईमानदारी से चला। वर्षों बाद लोग जब दूसरे को सम्मान से देखते, तो कहते—“यह अपने पिता की वसीयत निभा रहा है।” यहाँ वसीयत कोई काग़ज़ नहीं, बल्कि वह मूल्य थे जो पिता ने जीवन से सिखाए थे।
एक और उदाहरण में गुरुजी कहते हैं—कभी-कभी बच्चे अपने दादा या नाना को देखे बिना भी उन्हीं की तरह व्यवहार करते हैं। लोग कहते हैं, “इसके बोलने का ढंग वही है।” यह समानता रक्त से नहीं, संस्कार से आती है। यही वह विरासत है, जो बिना बताए पीढ़ियों को जोड़ देती है।
गुरुजी अंत में शांत स्वर में कहते हैं कि जब हम अपने व्यवहार पर ध्यान देते हैं, तो वास्तव में हम अपने पूर्वजों की वसीयत का सम्मान या अपमान कर रहे होते हैं। यदि हमारे कर्म करुणा, सत्य और मर्यादा से भरे हैं, तो समझिए कि हमें अमूल्य धरोहर मिली है। और यदि हम अपने संस्कारों को सँवारते हैं, तो हम स्वयं अगली पीढ़ी के लिए एक नई, उज्ज्वल वसीयत तैयार कर रहे होते हैं—ऐसी वसीयत जो समय से परे जीवित रहती है।
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