इच्छा के पार ही शांति का द्वार
इच्छा के पार ही शांति का द्वार
“किसी की भी यदि शांति की इच्छा हो तो पहले इच्छा को शांत करो..!”
यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा का द्वार है। जब आचार्य निखिल यह कहते हैं, तब वे बाहरी जीवन की उलझनों को नहीं, बल्कि मन की गहराइयों में चल रहे उस सूक्ष्म संघर्ष को देख रहे होते हैं, जहाँ हर व्यक्ति शांति चाहता है, पर उसी चाह के कारण अशांत बना रहता है।
उनकी मनःस्थिति उस साधक की है, जिसने इच्छा और शांति के इस विरोधाभास को अनुभव किया है। वे देख रहे हैं कि मनुष्य शांति को भी एक लक्ष्य बना लेता है—जैसे कोई वस्तु हो, जिसे प्राप्त करना है। और यही सबसे बड़ी भूल है। इच्छा का स्वभाव ही है—अपूर्णता का बोध कराना। जब तक इच्छा है, तब तक ‘अभी कुछ कमी है’ का भाव बना रहता है। ऐसे में शांति कैसे संभव हो सकती है, जो पूर्णता का अनुभव है?
गुरु जी कहते हैं—“तुम शांति को चाहते हो, इसका अर्थ है कि तुम अभी अशांत हो। और जब तक तुम ‘चाहते’ रहोगे, अशांति बनी रहेगी। क्योंकि चाहना ही अशांति की जड़ है।”
दृष्टांत
वे एक दृष्टांत देते हैं—एक व्यक्ति नदी के किनारे बैठा है और पानी में अपना चेहरा देखना चाहता है। पर जैसे ही वह पानी को छूता है, लहरें उठ जाती हैं और प्रतिबिंब टूट जाता है। वह बार-बार कोशिश करता है, पानी को स्थिर करने की, लेकिन जितना प्रयास करता है, पानी उतना ही अशांत होता जाता है। तब एक संत उसे कहते हैं—“तुम पानी को मत छुओ, बस शांत बैठ जाओ… पानी स्वयं शांत हो जाएगा, और तुम्हारा चेहरा स्पष्ट दिखेगा।”
गुरु जी मुस्कराते हुए कहते हैं—“तुम्हारा मन भी वही पानी है। तुम शांति पाने के लिए जितना प्रयास करते हो, उतना ही मन को विचलित करते हो। प्रयास नहीं, विराम चाहिए।”
उनकी वाणी में करुणा है, क्योंकि वे जानते हैं कि मनुष्य अपनी इच्छाओं से बंधा हुआ है। पर साथ ही उनकी दृष्टि अत्यंत स्पष्ट है—वे यह भी जानते हैं कि मुक्ति का मार्ग इच्छा को पूरा करने में नहीं, बल्कि उसे समझकर उससे ऊपर उठने में है।
दृष्टांत
एक और उदाहरण वे देते हैं—एक बालक तितली को पकड़ना चाहता है। वह दौड़ता है, छलांग लगाता है, लेकिन तितली उससे दूर ही रहती है। थककर जब वह एक फूल के पास शांत बैठ जाता है, तो वही तितली आकर उसके कंधे पर बैठ जाती है। गुरु जी कहते हैं—“शांति भी उसी तितली की तरह है। जितना तुम उसके पीछे भागोगे, वह उतनी दूर भागेगी। और जब तुम ठहर जाओगे, तो वह स्वयं तुम्हारे पास आ जाएगी।”
आचार्य निखिल की यह वाणी भीतर की उस निस्तब्धता से उपजी है, जहाँ इच्छाएँ थम जाती हैं और केवल साक्षी भाव शेष रहता है। वे हमें यह नहीं कह रहे कि जीवन में कुछ चाहो ही मत, बल्कि यह समझा रहे हैं कि ‘शांति’ को भी चाहना एक सूक्ष्म जाल है। शांति कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि वह अवस्था है, जो तब प्रकट होती है जब सभी उपलब्धियों की दौड़ थम जाती है।
अंत में वे धीमे स्वर में कहते हैं—“जिस दिन तुमने यह समझ लिया कि तुम्हें कुछ भी पाने की आवश्यकता नहीं है, उसी दिन तुम पाओगे कि सब कुछ पहले से ही तुम्हारे भीतर है। वही शांति है, वही आनंद है… और वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।”
वक्ता
आचार्य निखिल जी महाराज
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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