स्वयं का मूल्य: जीवन का प्रथम धर्म
स्वयं का मूल्य
जीवन का प्रथम धर्म
जब आचार्य निखिल कहते हैं—
“आप खुद का यदि ख्याल रखो तो आपसे ज्यादा मूल्यवान इस दुनिया में कुछ भी नहीं है।”
यह कथन सुनने में भले सरल लगे, पर इसके भीतर आत्मबोध, आत्मसम्मान और आत्मसंरक्षण का अत्यंत गहरा संदेश छिपा है। यह वाक्य उस अनुभूति से जन्मा प्रतीत होता है जहाँ व्यक्ति जीवन के अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरकर यह समझ लेता है कि संसार में सबसे अधिक उपेक्षित वही व्यक्ति होता है, जो स्वयं को ही उपेक्षित कर देता है।
उस क्षण गुरु जी की मनःस्थिति अत्यंत करुणामयी और जागरूक रही होगी। वे मानो अपने अनुभवों से यह देख चुके हैं कि मनुष्य दूसरों के लिए तो बहुत कुछ करता है, पर स्वयं के लिए समय, ध्यान और सम्मान देने में कंजूसी कर देता है। वे अपने शिष्यों को यह समझाना चाहते हैं कि आत्म-देखभाल कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि जीवन का मूल कर्तव्य है। यदि भीतर ही शून्यता, थकान और उपेक्षा होगी, तो बाहर दिया गया प्रेम भी अधूरा होगा।
गुरु जी की वाणी में मानो यह भाव प्रवाहित हो रहा है—“तुम इस संसार में सबसे पहले स्वयं के प्रति उत्तरदायी हो। यदि तुम स्वयं को ही थका दोगे, तो किसी और को क्या सहारा दे पाओगे? यदि तुम्हारा मन ही बिखरा हुआ है, तो तुम किसी और के जीवन में स्थिरता कैसे ला सकोगे?”
इसे एक दृष्टांत से समझिए। एक दीपक था, जो हर रात दूसरों को रोशनी देने के लिए जलता था। धीरे-धीरे उसका तेल समाप्त होने लगा, पर वह जलता रहा, यह सोचकर कि दूसरों को अंधेरे में नहीं छोड़ सकता। एक दिन वह पूरी तरह बुझ गया। अब न वह स्वयं रोशनी में था, न दूसरों को रोशनी दे पा रहा था। पास खड़े एक ज्ञानी ने कहा—“यदि इस दीपक ने समय रहते अपने तेल का ख्याल रखा होता, तो यह अधिक समय तक स्वयं भी प्रकाशित रहता और दूसरों को भी प्रकाश देता।” यही आत्म-देखभाल का सत्य है।
एक और दृष्टांत पर विचार कीजिए। एक वृक्ष था जो हर आने-जाने वाले को फल देता, छाया देता, लकड़ी देता। समय बीतने के साथ उसने स्वयं की जड़ों की देखभाल करना छोड़ दिया। एक दिन तेज़ आँधी आई और वह वृक्ष गिर पड़ा। तब लोगों ने कहा—“यह तो बहुत उदार था, फिर भी गिर गया।” एक संत ने उत्तर दिया—“उदारता तब तक ही टिकती है, जब तक जड़ें मजबूत हों। जिसने अपनी जड़ों का ख्याल नहीं रखा, वह दूसरों को स्थायित्व कैसे दे सकता है?”
गुरु जी का यह कथन उसी गहरे जीवन-सत्य को उजागर करता है कि स्वयं का मूल्य समझना ही सच्चे जीवन की शुरुआत है। यह अहंकार नहीं, बल्कि आत्मबोध है। यह दूसरों से ऊपर उठने की बात नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से मजबूत करने की बात है। जब व्यक्ति स्वयं का ध्यान रखता है—अपने मन, शरीर और आत्मा का—तभी वह वास्तव में इस दुनिया के लिए कुछ सार्थक कर पाता है।
और अंततः, गुरु जी मानो यह कह रहे हों—
“तुम्हारा अस्तित्व ही तुम्हारा सबसे बड़ा धन है। यदि तुम स्वयं को खो दोगे, तो संसार की कोई भी उपलब्धि तुम्हें पूर्ण नहीं कर पाएगी। इसलिए स्वयं को संजोना सीखो, क्योंकि जब तुम अपने साथ हो जाते हो, तब पूरी दुनिया अपने आप तुम्हारे साथ हो जाती है।”
सृजक
आचार्य निखिल जी महाराज
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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