सत्य का एक क्षण, भ्रम के हजार वर्षों से श्रेष्ठ

सत्य का एक क्षण, भ्रम के हजार वर्षों से श्रेष्ठ

जब आचार्य निखिल यह कहते हैं— 

“सत्य से रूबरू होने का एक क्षण, भ्रम के हजार वर्षों से अधिक मूल्यवान है।”

तब वे केवल सत्य की महिमा का गुणगान नहीं कर रहे होते, बल्कि मनुष्य को उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल से परिचित करा रहे होते हैं। वह भूल है—भ्रम को ही सत्य मानकर जीते रहना। उनका यह कथन केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि आत्मजागरण का ऐसा दीप है जो चेतना के अंधकार को एक ही क्षण में प्रकाशित कर सकता है।

उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत निर्मल, आत्मानुभूति से ओत-प्रोत और करुणा से भरी हुई प्रतीत होती है। वे संभवतः उन असंख्य लोगों को देख रहे होते हैं जो वर्षों तक अहंकार, मोह, भय, झूठी मान्यताओं और कल्पनाओं में जीवन व्यतीत कर देते हैं। वे अनुभव कर रहे होते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनके बारे में उसके भ्रम हैं। इसलिए वे सत्य को केवल जानने की नहीं, बल्कि उसके सामने नतमस्तक होने की प्रेरणा देते हैं।

गुरुजी मानो अपने शिष्यों से कह रहे हों— “भ्रम चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, वह सत्य नहीं बन जाता। और सत्य चाहे एक क्षण के लिए ही सामने आए, वह जीवन की दिशा बदल देने के लिए पर्याप्त होता है। अंधकार हजार वर्षों तक किसी गुफा में रह सकता है, पर जैसे ही एक दीपक जलता है, अंधकार का इतिहास उसी क्षण समाप्त हो जाता है।”

वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक व्यक्ति रात के अंधेरे में रास्ते पर पड़ी रस्सी को साँप समझकर पूरी रात भय से काँपता रहा। उसने न आगे कदम बढ़ाया, न पीछे लौटा। सुबह सूर्य निकला तो उसने देखा कि वहाँ साँप नहीं, केवल एक साधारण रस्सी थी। पूरी रात का भय एक क्षण के सत्य के सामने समाप्त हो गया। गुरुजी मुस्कुराकर कहते हैं— “भय साँप से नहीं था, भ्रम से था। सत्य ने केवल एक पल लिया, लेकिन उसने पूरी रात की पीड़ा मिटा दी।”

फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक राजकुमार बचपन में बिछड़ गया और एक साधारण परिवार में पलने लगा। वर्षों तक वह स्वयं को एक गरीब युवक समझता रहा। एक दिन राज्य का वृद्ध मंत्री उसे खोजते हुए पहुँचा और उसके जन्म के प्रमाण प्रस्तुत किए। उस एक क्षण में युवक की पहचान बदल गई। उसकी वास्तविकता नई नहीं थी; वह तो जन्म से ही राजकुमार था। बदला केवल उसका भ्रम था। गुरुजी समझाते हैं— “आत्मा भी ऐसी ही है। हम स्वयं को केवल शरीर, नाम और पद मानकर जीते रहते हैं। जिस दिन अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है, उसी दिन जीवन का अर्थ बदल जाता है।”

आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस गहरे अनुभव से भरी होती है कि मनुष्य भ्रमों का संग्रहकर्ता बन गया है। कोई धन को स्थायी मान बैठा है, कोई शरीर को ही अपना सम्पूर्ण अस्तित्व समझ रहा है, कोई दूसरों की प्रशंसा में अपनी पहचान खोज रहा है, तो कोई अपने दुःख को ही अपना भाग्य मान चुका है। वे इन सभी मानसिक परदों को हटाकर सत्य का सूर्य दिखाना चाहते हैं।

उनकी वाणी में करुणा इसलिए है कि वे जानते हैं—भ्रम में जीने वाला व्यक्ति दोषी नहीं, केवल अज्ञानी है। जैसे सोया हुआ व्यक्ति सपना सच मान लेता है, वैसे ही अज्ञान में डूबा मनुष्य अपने भ्रमों को वास्तविकता समझ बैठता है। गुरुजी उसे झकझोरते नहीं, प्रेम से जगाते हैं। वे कहते प्रतीत होते हैं— “सत्य से मत डरो। सत्य कभी तुम्हारा शत्रु नहीं होता। वह केवल तुम्हारे भ्रमों का अंत करता है, तुम्हारा नहीं।”

वे आगे समझाते हैं कि सत्य कभी-कभी कड़वा अवश्य लगता है, क्योंकि वह अहंकार को तोड़ता है, झूठे विश्वासों को गिराता है और मन की कल्पनाओं को समाप्त करता है। किंतु उसी टूटन से वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। भ्रम मन को क्षणिक सुख देता है, पर सत्य आत्मा को स्थायी शांति देता है।

अंततः आचार्य निखिल मानो यही कह रहे हों— 

“जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि लंबा जीवन नहीं, बल्कि जागृत जीवन है। यदि तुम्हें सत्य का साक्षात्कार एक क्षण के लिए भी हो जाए, तो वह क्षण हजार वर्षों के अज्ञान से अधिक मूल्यवान है। क्योंकि भ्रम समय बढ़ाता है, सत्य चेतना जगाता है। और जिस दिन चेतना जाग जाती है, उसी दिन जीवन केवल बीतता नहीं, बल्कि वास्तव में प्रारंभ होता है।”

वक्ता

 
आचार्य निखिल जी महाराज
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति










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