शून्यता का सौंदर्य और ईश्वर का स्पर्श






शून्यता का सौंदर्य और ईश्वर का स्पर्श

जब आचार्य निखिल कहते हैं—

“बांसुरी खाली थी, इसीलिए यदि प्रभु श्रीकृष्ण ने उसे चुना तो यह चयन ही जताता है कि शून्य ही ईश्वर का माध्यम बनता है,” 

तब यह केवल एक आध्यात्मिक पंक्ति नहीं होती, बल्कि आत्मा के गहनतम सत्य का उद्घाटन होता है। उस क्षण उनकी मनःस्थिति अत्यंत शांत, निर्मल और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से भरी हुई प्रतीत होती है। वे मानो मनुष्य के भीतर भरे हुए अहंकार, इच्छाओं और स्वयं के महत्व के भ्रम को धीरे-धीरे हटाकर उसे उसकी वास्तविक अवस्था से परिचित कराना चाहते हैं।

गुरुजी जैसे उस समय कह रहे हों—

“जब तक तुम अपने भीतर स्वयं से भरे हुए हो, तब तक ईश्वर तुम्हारे भीतर कैसे उतरेंगे? जिस पात्र में पहले से ही शोर भरा हो, उसमें संगीत कहाँ उतर सकता है?” 

उनकी चेतना उस समय अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर होती है। वे यह समझ चुके होते हैं कि जीवन का सबसे बड़ा सौंदर्य ‘कुछ बन जाने’ में नहीं, बल्कि स्वयं को इतना रिक्त कर देने में है कि परमात्मा स्वयं तुम्हारे माध्यम से बोलने लगे।

बांसुरी का उदाहरण उनके लिए केवल एक वाद्य यंत्र का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन का दर्पण है। बांसुरी यदि भीतर से भरी होती, गाँठों से जकड़ी होती, तो श्रीकृष्ण के अधरों तक कभी नहीं पहुँचती। उसकी सबसे बड़ी योग्यता उसका खाली होना था। यही शून्यता उसे ईश्वर के संगीत का माध्यम बना गई। आचार्य निखिल उसी सत्य की ओर संकेत करते हैं कि जो भीतर से रिक्त होता है, वही दिव्यता को धारण कर पाता है।

दृष्टांत 

एक दृष्टांत के रूप में वे शायद यह कहें—एक बार एक शिष्य अपने गुरु के पास ज्ञान लेने पहुँचा। वह अपने ज्ञान, अपनी उपलब्धियों और अपने विचारों का इतना वर्णन करता रहा कि गुरु शांत होकर केवल चाय बनाते रहे। उन्होंने कप भर दिया, लेकिन फिर भी उसमें चाय डालते रहे। चाय बाहर गिरने लगी। शिष्य ने आश्चर्य से कहा—“गुरुदेव, कप तो भर चुका है।” गुरु मुस्कुराए और बोले—“ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारा मन। जब तक यह अपने ही विचारों से भरा रहेगा, उसमें नया ज्ञान कैसे समाएगा?” यही शून्यता का रहस्य है—रिक्त होना ही ग्रहण करने की क्षमता बनाता है।

एक और दृष्टांत में वे बताते हैं—आकाश सबसे विशाल इसलिए है क्योंकि उसमें कुछ भी अपना नहीं है। बादल आते हैं, चले जाते हैं; पक्षी उड़ते हैं, फिर लौट जाते हैं; सूरज उगता है, डूब जाता है—लेकिन आकाश किसी को पकड़कर नहीं रखता। उसकी यही रिक्तता उसे अनंत बना देती है। मनुष्य भी जब भीतर से ऐसा ही हो जाता है, तब ईश्वर उसकी चेतना में सहज ही उतरने लगते हैं।

आचार्य निखिल की उस अवस्था में चेतना अत्यंत ध्यानमग्न और समर्पित होती है। वे संसार को यह बताना चाहते हैं कि ईश्वर को पाने का मार्ग बाहरी प्रदर्शन से नहीं, भीतर की शांति और रिक्तता से होकर गुजरता है। वे यह नहीं कहते कि जीवन छोड़ दो, बल्कि यह कहते हैं कि जीवन के भीतर से ‘मैं’ को थोड़ा कम कर दो। क्योंकि जहाँ ‘मैं’ कम होता है, वहीं ‘वह’ प्रकट होने लगता है।

उनकी यह वाणी किसी तर्क का परिणाम नहीं लगती, बल्कि किसी गहरे ध्यान में अनुभव किए गए सत्य की तरह बहती है। जैसे कोई साधक मौन में बैठकर यह अनुभव कर चुका हो कि परमात्मा शब्दों में नहीं उतरते, वे तो उसी हृदय में उतरते हैं जो बांसुरी की तरह भीतर से खाली, सरल और समर्पित हो। तभी उस जीवन से फिर संगीत निकलता है—ऐसा संगीत जो केवल सुना नहीं जाता, बल्कि आत्मा में महसूस किया जाता है।

वक्ता

आचार्य निखिल जी महाराज

सहारनपुर

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 


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