आचार्य निखिल जी महाराज का संबोधन

भूमिका

हमारे जीवन की दशा और दिशा हमारा ज्ञान और बुद्धिमता तय करते हैं और Nature, कुदरत और प्रकृति हमको सदैव सुरक्षा का आवरण हमारी बुद्धिमता और ज्ञान के माध्यम से दे देती है और बुद्धिमता और ज्ञान से संपन्न विभूतियाँ अपने प्रवचनों के माध्यम से समाज को दिशा देने के लिए प्रयासरत rahte हैं तो यहाँ पर एक ऐसी ही विभूति के विचार प्रवचन के रूप में नागरिकों को लाभान्वित करने के ध्येय से प्रस्तुत किये जा रहे हैं। 

आचार्य निखिल जी महाराज का संबोधन

“सुनो साधको…

जीवन बड़ा विचित्र है। सामान्य समय में हम अपनी आँखों पर, अपनी दृष्टि पर बड़ा गर्व करते हैं। हमें लगता है—‘हम सब देख सकते हैं, हम सब समझ सकते हैं।’ परंतु जब जीवन की आंधियाँ चलती हैं, जब कठिनाइयों का तूफ़ान हमें घेर लेता है… तब वही आँखें काँप जाती हैं।

उसी क्षण समझ आता है कि असली सहारा तो आँखों का नहीं, पलकों का है।
पलकों ने ही हर आंधी में आँखों को बचाए रखा।

आचार्य निखिल जी महाराज का यह संदेश हमें यही सिखाता है—
कि जिस पर हम अक्सर गर्व करते हैं, वह शायद उतना महत्वपूर्ण नहीं,
बल्कि जो हमें भीतर से सँभालता और सुरक्षित रखता है, उसकी क़ीमत कहीं ज़्यादा है।

आंखें ज्ञान का प्रतीक हैं, पर पलकें संयम और संरक्षण का।
ज्ञान तभी तक उपयोगी है, जब तक वह विनम्रता और धैर्य की पलकों से सुरक्षित है।

भाइयों और बहनों, संकट ही हमें यह अहसास कराते हैं कि जीवन का हर छोटा-सा सहारा,
हर छोटी-सी ढाल, कितनी बड़ी नेमत है।

इसलिए आचार्य जी की मनःस्थिति उस समय एक अनुभवी साधक की रही होगी,
जो चाहता है कि हम सब अपने जीवन में विनम्रता को अपनाएँ,
संयम का महत्व समझें
और कठिनाइयों में छिपी शिक्षाओं को पहचानें।

"आंधियाँ हर किसी के जीवन में चलती हैं,
पर वही बच पाता है जो पलकों की क़ीमत समझ लेता है।”

आइडिया 💡 

शब्दशिल्प

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प्रस्तुति




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