मर्यादा में महिमा, संस्कारों में सुकून
मर्यादा में महिमा, संस्कारों में सुकून
कथन
“मर्यादा को लांघकर चर्चित हो जाना, कोई बड़ी बात नहीं। सुकून तो तब है, जब संस्कारों की सीमा में रहकर दिलों में जगह बनाई जाए…”
कथन विश्लेषण
आचार्य निखिल ने जब यह वाक्य कहा होगा, तब उनकी वाणी में केवल शब्द नहीं, एक अनुभवी साधक की तपश्चर्या बोल रही होगी। उनकी मनःस्थिति उस क्षण अवश्य ही गंभीर, करुणामय और सजग रही होगी। उन्होंने समाज में यह प्रवृत्ति देखी होगी कि लोग चर्चा में आने के लिए सीमाएँ तोड़ने में भी संकोच नहीं करते। प्रसिद्धि को उपलब्धि समझ लिया गया है, और शोर को प्रभाव। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए यह गहन वाक्य उनके अंतर्मन से निकला होगा।
गुरु जी प्रवचन में समझाते हैं कि मर्यादा कोई बंधन नहीं, बल्कि वह रेखा है जो हमें गिरने से बचाती है। नदी जब अपने तटों के भीतर बहती है तो जीवन देती है, खेतों को सींचती है, प्यास बुझाती है। पर वही नदी जब तट तोड़ देती है, तो बाढ़ बन जाती है। वह चर्चित तो होती है, पर उसके साथ विनाश की कथा जुड़ जाती है। इसी प्रकार मनुष्य जब मर्यादा के भीतर रहता है, तो उसका व्यक्तित्व पोषण करता है; और जब वह सीमा लांघता है, तो भले ही वह चर्चा में आ जाए, पर भीतर शांति खो देता है।
गुरु जी एक दृष्टांत देते हैं—एक युवक ने सोचा कि वह सबका ध्यान आकर्षित करेगा। उसने अजीब व्यवहार किया, परंपराओं का उपहास किया, और थोड़े ही समय में लोग उसे जानने लगे। पर जो लोग उसे जानते थे, वे उसे सम्मान नहीं देते थे। उसी गाँव में एक और व्यक्ति था, जो शांत स्वभाव का था, अपने संस्कारों का पालन करता था, दूसरों का आदर करता था। उसका नाम भले अखबारों में नहीं आया, पर हर हृदय में उसका स्थान था। जब किसी को आवश्यकता होती, तो वही व्यक्ति याद आता। चर्चा क्षणिक थी, पर हृदय का स्थान स्थायी।
फिर गुरु जी कहते हैं—आतिशबाज़ी आकाश में चमकती है, सबकी आँखें उसकी ओर उठ जाती हैं। पर वह कुछ ही क्षणों में बुझ जाती है। वहीं एक दीपक घर के कोने में शांत जलता है, पर पूरी रात अंधकार हरता है। आतिशबाज़ी चर्चित है, दीपक सम्मानित। जीवन का चुनाव हमें करना है कि हम क्षणिक चमक बनना चाहते हैं या स्थायी प्रकाश।
आचार्य निखिल की मनःस्थिति उस समय एक ऐसे गुरु की रही होगी, जो अपने शिष्यों को बाहरी तालियों से बचाकर आंतरिक संतोष की ओर ले जाना चाहता है। वे यह समझाना चाहते थे कि सच्चा सुकून तब मिलता है जब मन को यह संतोष हो कि हमने अपने संस्कारों का उल्लंघन नहीं किया। दिलों में जगह बनाना कठिन है, क्योंकि वहाँ छल से प्रवेश नहीं मिलता; वहाँ केवल सत्य, विनम्रता और आचरण की शुद्धता से ही स्थान मिलता है।
गुरु जी अंत में सहज भाव से कहते हैं कि मर्यादा में रहकर जीना साधना है। संस्कारों की सीमा में रहना आत्म-सम्मान है। और जो व्यक्ति इस साधना को अपनाता है, उसे प्रसिद्धि का शोर नहीं चाहिए। उसका मौन ही उसकी पहचान बन जाता है, और लोगों के दिलों में जो स्थान मिलता है, वही जीवन का सच्चा सुकून बन जाता है।
वक्ता




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