समर्पण से कर्म, और कर्म से स्पष्टता (प्रवचन)

समर्पण से कर्म, और कर्म से स्पष्टता

कथन

“प्रत्येक कर्म को ईश्वर-समर्पण भाव से करें तो पथ स्पष्ट और फल सुनिश्चित।”

कथन विश्लेषण

आचार्य निखिल का यह कथन किसी उपदेशात्मक ऊँचाई से नहीं, बल्कि गहन अनुभूति और आत्म-साक्षात्कार की भूमि से उपजा हुआ प्रतीत होता है। ऐसा कहते समय उनकी मनःस्थिति अत्यंत स्थिर, शांत और निष्काम रही होगी। यह कथन उस व्यक्ति का हो सकता है जिसने कर्म की उलझनों, अपेक्षाओं के बोझ और फल की चिंता से उपजने वाले मानसिक द्वंद्व को स्वयं जिया हो और फिर उससे ऊपर उठने का मार्ग खोज लिया हो।

गुरुजी प्रवचन के स्वर में कहते हैं कि मनुष्य का अधिकांश भ्रम कर्म को लेकर नहीं, बल्कि कर्म के फल को लेकर होता है। जब हम कोई कार्य करते हैं, तो उसके साथ ही परिणाम की आकांक्षा, प्रशंसा की चाह और असफलता का भय जोड़ लेते हैं। यही जोड़ हमारे पथ को धुंधला कर देता है। समर्पण का अर्थ कर्म से पलायन नहीं है, बल्कि कर्म को अहंकार से मुक्त करना है। जब कर्म “मैं कर रहा हूँ” से निकलकर “मुझसे हो रहा है” या “ईश्वर के लिए हो रहा है” बन जाता है, तब मन हल्का हो जाता है और निर्णय सहज।

गुरुजी एक दृष्टांत सुनाते हैं—एक किसान बीज बोता है। वह बीज को ज़मीन में डालते समय यह शर्त नहीं रखता कि फसल कैसी होगी, कितनी होगी या लोग उसकी प्रशंसा करेंगे या नहीं। वह अपना कर्म करता है—भूमि तैयार करता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है—और शेष प्रकृति पर छोड़ देता है। यही समर्पण है। किसान का यह भाव ही उसके पथ को स्पष्ट रखता है; इसलिए उसका श्रम व्यर्थ नहीं जाता।

फिर गुरुजी कहते हैं—एक दीपक को देखो। वह यह नहीं सोचता कि उसका प्रकाश कौन देखेगा या कौन नहीं। उसका धर्म है जलना और उजाला देना। जब वह पूरी निष्ठा से जलता है, तो अंधकार अपने आप दूर हो जाता है। ठीक वैसे ही, जब मनुष्य अपने कर्म को ईश्वर को अर्पित कर देता है, तब उसे हर मोड़ पर संकेत मिलने लगते हैं। निर्णय में द्वंद्व कम होता है, और परिणाम चाहे जैसा हो, मन में स्वीकार भाव बना रहता है।

आचार्य निखिल की मनःस्थिति इस कथन के समय किसी साधक की रही होगी, जिसने समझ लिया हो कि फल की सुनिश्चितता का अर्थ मनचाहा परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक शांति है। जब कर्म समर्पण से किया जाता है, तो असफलता भी सीख बन जाती है और सफलता भी अहंकार नहीं बढ़ाती। पथ इसलिए स्पष्ट हो जाता है क्योंकि मन बोझ से मुक्त होता है, और फल इसलिए सुनिश्चित होता है क्योंकि वह मन को बाँधता नहीं, बल्कि परिपक्व करता है।

गुरुजी अंत में सहज मुस्कान के साथ कहते हैं कि ईश्वर-समर्पण कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। जब हर छोटा-बड़ा कर्म उसी भाव से किया जाए, तो जीवन की यात्रा संघर्ष नहीं, साधना बन जाती है—और यही साधना मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचा देती है।

वक्ता





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