महाशिवरात्रि पर आचार्य निखिल का विशेष संबोधन

 महाशिवरात्रि पर विशेष

अज्ञान से जागरण की रात्रि 

शिवत्व का आह्वान

“नमः शिवाय शान्ताय नमः कैलासवासिने, नमः पशुपतये तुभ्यं नमस्ते विश्वरूपिणे॥” — जब आचार्य निखिल ने महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर इन शब्दों के साथ अपने भाव व्यक्त किए होंगे, तब उनकी मनःस्थिति साधारण वक्ता की नहीं, बल्कि एक जाग्रत साधक की रही होगी, जो इस रात्रि को केवल उत्सव नहीं, आत्म-जागरण का आध्यात्मिक क्षण मानता है। उनके अंतर्मन में यह स्पष्ट बोध रहा होगा कि शिव की उपासना बाहरी अनुष्ठान से अधिक आंतरिक परिवर्तन की साधना है। वे यह देख रहे होंगे कि मनुष्य अक्सर पूजा तो करता है, पर जागता नहीं; व्रत तो रखता है, पर अपने भीतर के अंधकार को पहचानता नहीं। इसी अनुभूति ने उनके शब्दों को इतनी गहराई दी होगी।

गुरु जी प्रवचन में कहते हैं कि महाशिवरात्रि की रात्रि वास्तव में आत्मा की वह रात्रि है, जब अज्ञान की नींद टूटती है और चेतना का दीप प्रज्वलित होता है। शिव को केवल देवता कहना उनकी व्यापकता को सीमित करना है, क्योंकि शिव तो शांति की पराकाष्ठा, वैराग्य की ऊँचाई और करुणा की गहराई का नाम हैं। जब वे कहते हैं कि उपवास शरीर को शुद्ध करता है, जप मन को शुद्ध करता है और शिव-स्मरण आत्मा को शिवमय कर देता है, तब उनके भीतर यह भावना अवश्य रही होगी कि साधना का प्रत्येक आयाम क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। शरीर संयम से हल्का होता है, मन नाम-जप से निर्मल होता है और आत्मा स्मरण से अपने मूल स्वरूप को पहचानती है।

गुरु जी एक दृष्टांत देते हैं—एक व्यक्ति ने मंदिर में पूरी रात जागरण किया, भजन गाए, दीप जलाए, पर भीतर क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार से भरा रहा। दूसरी ओर एक साधक शांत बैठकर शिव का स्मरण करता रहा और अपने भीतर की अशांति को देखता रहा। प्रातः होते-होते पहले व्यक्ति को केवल थकान मिली, जबकि दूसरे साधक को शांति का अनुभव हुआ। गुरु जी मुस्कराकर कहते हैं कि जागरण आँखों का नहीं, चेतना का होना चाहिए। यही महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ है।

फिर वे दूसरा उदाहरण देते हैं—एक दर्पण पर धूल जमी हो तो उसमें चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता। जैसे ही उसे साफ किया जाता है, प्रतिबिंब स्वयं स्पष्ट हो जाता है। उसी प्रकार अहंकार, वासनाएँ और चित्त की चंचलता हमारे भीतर के शिवत्व को ढक देती हैं। उपवास धूल को हटाने का प्रयास है, जप दर्पण को स्वच्छ करने का साधन है और शिव-स्मरण उस प्रतिबिंब को पहचानने की प्रक्रिया है कि हम वास्तव में शुद्ध चेतना हैं।

आचार्य निखिल की उस समय की मनःस्थिति अत्यंत करुणामयी और अंतर्मुखी रही होगी। वे चाहते होंगे कि लोग शिव को केवल अभिषेक, बिल्वपत्र और रात्रि-जागरण तक सीमित न रखें, बल्कि शिव के “शान्ताय” स्वरूप को अपने भीतर उतारें। उनका भाव यह रहा होगा कि यदि चित्तवृत्तियाँ शांत हो जाएँ, तो जीवन स्वयं कैलास की शांति का अनुभव करने लगता है। अहंकार का क्षय ही सच्चा अभिषेक है और अंतःकरण में शिवत्व का प्रकट होना ही वास्तविक प्रसाद।

गुरु जी अंत में कहते हैं कि महाशिवरात्रि हमें यह स्मरण कराती है कि अंधकार से लड़ना नहीं, दीप जलाना है; अशांति को दबाना नहीं, उसे शिव-स्मरण में विलीन करना है। जब साधक श्रद्धा से “नमः शिवाय” का जप करता है, तब वह केवल ईश्वर को प्रणाम नहीं करता, बल्कि अपने भीतर के शिवतत्त्व को जागृत करता है। और उसी क्षण यह रात्रि साधारण रात्रि नहीं रहती, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, अशांति से शांति और अहंकार से शिवत्व की दिव्य यात्रा बन जाती है।

वक्ता

 
        आचार्य निखिल जी महाराज 
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 


 










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