वकालत से न्याय नहीं, आत्मदृष्टि से संतुलन
वकालत से न्याय नहीं, आत्मदृष्टि से संतुलन
जब आचार्य निखिल यह कहते हैं—
“मनुष्य जब अपनी गलती का वकील और दूसरों की गलतियों का जज बन जाता है, तो वह तटस्थ नहीं रह जाता और ऐसे में फैसले नहीं फासले होते हैं।”
यह कथन मानव स्वभाव की एक गहरी मनोवैज्ञानिक परत को उजागर करता है। उस समय उनकी मनःस्थिति अवश्य ही चिंतनशील और करुणामयी रही होगी। वे देख रहे होंगे कि संबंधों में दूरी का कारण परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारा पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण है। हम अपनी भूलों के पीछे तर्क खोज लेते हैं, परिस्थितियों को दोष दे देते हैं, लेकिन दूसरों की त्रुटियों को कठोर निर्णय के साथ देख लेते हैं। यही असंतुलन रिश्तों में दरार पैदा करता है।
गुरु जी अपने आत्मिक प्रवचन में समझाते हैं कि तटस्थता आत्मा का गुण है, और पक्षपात अहंकार का। जब मनुष्य अपनी गलती को उचित ठहराने में लग जाता है, तब वह स्वयं का वकील बन जाता है—हर तर्क उसके पक्ष में होता है, हर परिस्थिति उसका बचाव करती है। पर वही मनुष्य जब दूसरों की त्रुटि देखता है, तो तुरंत न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठ जाता है। वहाँ करुणा नहीं, कठोरता होती है; वहाँ समझ नहीं, निर्णय होता है। और यही निर्णय धीरे-धीरे दूरी का कारण बन जाते हैं।
आचार्य निखिल की उस क्षण की मनःस्थिति में यह स्पष्ट अनुभूति रही होगी कि मनुष्य का यह द्वैत ही संबंधों के टूटने का मूल कारण है। वे यह समझाना चाहते होंगे कि न्याय तब संभव है जब दृष्टि संतुलित हो। यदि हम अपने लिए नरमी और दूसरों के लिए कठोरता रखेंगे, तो तटस्थता समाप्त हो जाएगी और संवाद की जगह दूरी ले लेगी।
एक दृष्टांत के माध्यम से गुरु जी कहते हैं कि एक परिवार में दो भाई थे। बड़ा भाई अपनी गलती पर कहता, “मेरी मजबूरी थी,” और छोटे की गलती पर कहता, “यह उसकी आदत है।” धीरे-धीरे छोटे भाई के मन में पीड़ा बढ़ती गई। एक दिन उसने कहा, “यदि मेरी गलती आदत है, तो आपकी गलती भी आदत हो सकती है।” तब बड़े भाई को अपनी दृष्टि का असंतुलन समझ आया। गुरु जी समझाते हैं कि जब तक हम स्वयं के लिए छूट और दूसरों के लिए सजा का भाव रखते हैं, तब तक न्याय संभव नहीं।
फिर वे एक और उदाहरण देते हैं—एक गुरु ने अपने शिष्य से कहा, “दो थालियाँ लाओ—एक में अपने दोष लिखो और दूसरी में दूसरों के।” शिष्य ने देखा कि दूसरों की थाली शीघ्र भर गई, पर अपनी थाली लगभग खाली रही। गुरु ने मुस्कराकर कहा, “जब तक अपनी थाली नहीं भरोगे, तब तक दूसरों की थाली का भार तुम्हें भारी ही लगेगा।” शिष्य को समझ आया कि आत्मनिरीक्षण ही संबंधों को संतुलित रखता है।
आचार्य निखिल का यह कथन उस गहरी आत्मिक समझ से उपजा प्रतीत होता है कि संबंधों में निर्णय कम और समझ अधिक होनी चाहिए। उनकी मनःस्थिति उस समय एक ऐसे मार्गदर्शक की रही होगी, जो लोगों को यह सिखाना चाहता है कि न्याय का प्रारंभ स्वयं से होता है। यदि हम अपनी गलतियों को भी उतनी ही निष्पक्षता से देखें जितनी दूसरों की देखते हैं, तो मन में विनम्रता आएगी और संवाद जीवित रहेगा।
अंततः उनका संदेश यही है कि जब हम वकील और जज दोनों की भूमिका स्वयं ही निभाने लगते हैं, तो निष्पक्षता खो जाती है। और जहाँ निष्पक्षता नहीं, वहाँ निर्णय नहीं, केवल दूरी जन्म लेती है। इसलिए आवश्यक है कि हम पहले स्वयं को समझें, अपनी त्रुटियों को स्वीकारें, और दूसरों के लिए करुणा रखें। तभी फैसले न्यायपूर्ण होंगे और फासले मिट सकेंगे।
वक्ता







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