व्याख्यान
व्याख्यान
स्त्री का अंतर्मन: प्रेम और क्रोध का गहरा रिश्ता
वक्ता: डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'
स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ
अहमदाबाद (गुजरात)
आदरणीय उपस्थित सज्जनो, मातृशक्ति, बहनो एवं प्रिय साथियो,
आज मैं आप सबके सामने एक ऐसे विषय पर अपने विचार साझा करने के लिए उपस्थित हूँ, जो जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा और संवेदनशील है—“स्त्री का अंतर्मन: प्रेम और क्रोध का गहरा रिश्ता।”
अक्सर हम यह मान लेते हैं कि प्रेम और क्रोध दो विपरीत भावनाएँ हैं। हमें लगता है कि जहाँ प्रेम होगा, वहाँ शिकायत, रूठना या क्रोध नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि हम स्त्री के मन को थोड़ा ठहरकर समझने का प्रयास करें, तो पाएँगे कि उसका क्रोध कई बार उसके प्रेम की ही एक गहरी अभिव्यक्ति होता है।
स्त्री का मन अत्यंत संवेदनशील होता है। वह संबंधों को केवल निभाती नहीं, बल्कि उन्हें अपने भावनात्मक संसार में जीती है। यही कारण है कि वह उसी व्यक्ति से सबसे अधिक क्रोधित होती है, जिसे वह सबसे अधिक अपना मानती है। जिस व्यक्ति से मन का जुड़ाव ही न हो, उसके व्यवहार का असर भी बहुत कम होता है।
अब प्रश्न उठता है कि स्त्री क्रोधित क्यों होती है?
मेरे विचार से, उसके क्रोध का मूल कारण अपेक्षाएँ नहीं, बल्कि अपनत्व और विश्वास होता है। वह संबंधों में भावनात्मक ईमानदारी चाहती है। जब उसे लगता है कि उसकी भावनाओं को समझा नहीं गया, उसके समर्पण का सम्मान नहीं हुआ, या उसकी संवेदनाओं को हल्के में लिया गया, तब उसके भीतर एक मौन पीड़ा जन्म लेती है। वही पीड़ा कई बार क्रोध का रूप ले लेती है।
यहाँ एक बात विशेष रूप से समझनी होगी कि स्त्री का क्रोध प्रायः प्रतिशोध नहीं होता। वह किसी को हराना नहीं चाहती, बल्कि अपने मन की चोट को संभालने का प्रयास करती है। कई बार वह बोलती कम है, लेकिन उसका मौन बहुत कुछ कह जाता है।
हमने देखा है कि कई स्त्रियाँ दु:खी होने पर चुप हो जाती हैं। लोग समझते हैं कि शायद अब उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सच्चाई यह है कि वह मौन कई बार सबसे गहरी पुकार होता है। वह चाहती है कि उसका अपना व्यक्ति बिना कहे उसकी आँखों की भाषा पढ़ सके, उसके मौन में छिपी तकलीफ़ को समझ सके।
साथियों, प्रेम और आत्म-सम्मान का संतुलन भी स्त्री के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष है। स्त्री जब प्रेम करती है, तो पूरे मन से करती है। लेकिन वह अपने सम्मान को भी उतना ही महत्व देती है। इसलिए जब उसे ठेस पहुँचती है, तो वह स्वयं को समेट लेती है। उसका क्रोधित होना कई बार स्वयं के अस्तित्व और आत्म-सम्मान की रक्षा का प्रयास भी होता है।
मैं अक्सर एक उदाहरण देती हूँ—
यदि प्रेम को एक नदी मान लिया जाए, तो क्रोध उसके किनारों की तरह है। नदी को दिशा देने के लिए किनारे आवश्यक होते हैं। उसी प्रकार संबंधों में प्रेम जितना आवश्यक है, उतना ही आत्म-सम्मान और संवेदनशील समझ भी आवश्यक है। केवल प्रेम हो और सम्मान न हो, तो संबंध कमजोर पड़ने लगते हैं। और यदि प्रेम ही न हो, तो क्रोध का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इसलिए हमें स्त्री के क्रोध को केवल “गुस्सा” मानकर खारिज नहीं करना चाहिए। उसके पीछे छिपे संदेश को समझने का प्रयास करना चाहिए। कई बार उसका क्रोधित होना यह पूछने जैसा होता है—
“क्या तुम सच में मुझे समझते हो?”
अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि स्त्री का क्रोध अक्सर उसके प्रेम की गहराई को व्यक्त करता है। इसलिए उससे डरने या उसे गलत समझने की बजाय, उसके भीतर छिपे अपनत्व, विश्वास और भावनात्मक सच्चाई को समझना अधिक आवश्यक है। संबंध तभी सुंदर बनते हैं, जब उनमें केवल शब्द नहीं, बल्कि संवेदनाओं को समझने की क्षमता भी हो।
आप सभी का हृदय से धन्यवाद।
वक्ता
डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'
स्थानीय संपादिका,
उलझन सुलझन (महिला प्रकोष्ठ)
अहमदाबाद (गुजरात)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार






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