मानव जीवन की अवस्थाओं संबंधी चिंतनशील प्रवचन

 हरिओम।

मानव जीवन की अवस्थाओं संबंधी चिंतनशील प्रवचन

सुलोचना धनावत

मनुष्य जीवन ईश्वर का अनुपम उपहार है। यह केवल जन्म लेने और समय बिताने का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक अवस्था को समझते हुए सार्थक ढंग से जीने की कला है। आज मैं मनुष्य जीवन की चार अवस्थाओं के विषय में अपने कुछ विचार विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत कर रही हूँ। उससे पहले मैं वृद्धावस्था को सहज, संतुलित और आनंदमय बनाने के संबंध में कुछ कहना चाहूँगी।

वृद्धावस्था 

जीवन को समझने और सँवारने का समय

वृद्धावस्था जीवन की संध्या है। यह केवल शरीर के ढलने का समय नहीं, बल्कि अनुभव, आत्मचिंतन और आध्यात्मिकता से जुड़ने का अवसर भी है। इस अवस्था में यदि कुछ छोटे-छोटे परिवर्तन अपने व्यवहार और सोच में ला लिए जाएँ, तो जीवन सरल और शांतिपूर्ण बन सकता है।

सबसे पहले स्वयं को समझना और पहचानना आवश्यक है। परिवार में रहते हुए सबके स्वभाव और मनोभावों को समझकर व्यवहार करना चाहिए। बिना आवश्यकता किसी को टोकना-टाकी करना, हर बात में हस्तक्षेप करना या अनावश्यक ज्ञान देना कई बार संबंधों में दूरी उत्पन्न कर देता है। इसलिए जितना संभव हो, अधिक सुनें, कम बोलें और धैर्य के साथ परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखें।

जीवन में जो घट रहा है, उसे हर समय बदलना संभव नहीं होता। अतः मन को दृढ़ बनाकर कुछ बातों को मौन रहकर देखना भी सीखना चाहिए। अपने मन का दुःख हर किसी के सामने व्यक्त करने के बजाय, जीवनसाथी के साथ साझा करना अधिक सहज होता है, क्योंकि वही जीवनभर का सच्चा सहभागी होता है।

जीवन में जो भी मिले—रूखी-सूखी रोटी ही क्यों न हो—उसे ईश्वर का प्रसाद समझकर प्रेम से ग्रहण करना चाहिए। वृद्धावस्था में खाली समय को चिंता का कारण बनाने के बजाय, उसे सार्थक कार्यों में लगाना चाहिए। पढ़ना-लिखना पुनः आरंभ किया जा सकता है। सत्संग, भजन, कीर्तन और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ाव जीवन में नए आनंद का संचार करता है।

जीवनसाथी का सम्मान और आदर करना भी अत्यंत आवश्यक है। अंत तक वही आपका सच्चा संबल होता है। प्रेम का सबसे गहरा रिश्ता उसी के साथ होता है—इस सत्य को समय रहते स्वीकार लेना चाहिए।

यह भी स्मरण रखना चाहिए कि कौन पहले जाएगा, यह कोई नहीं जानता। एक दिन जीवन में अकेलापन आ सकता है, इसलिए मानसिक रूप से स्वयं को आत्मनिर्भर और परिस्थितियों के अनुकूल बनाना चाहिए। यही जीवन का चक्र है। इसे समझते हुए, समझौते और संतोष के साथ, प्रभु चरणों में समर्पित होकर जीना ही सच्चा जीवन है।

मानव जीवन की विविध अवस्थाएँ 

प्रकृति से सीख

यदि हम प्रकृति को ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि मनुष्य जीवन और सूर्य की यात्रा में अद्भुत समानता है।

पहली अवस्था 

बाल्यकाल — उगते सूर्य की भाँति

प्रातःकाल जब सूर्य उदित होता है, उसकी कोमल किरणें समस्त सृष्टि को आनंदित कर देती हैं। पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देता है, फूल खिल उठते हैं, मंदिरों में घंटियाँ बजने लगती हैं और चारों ओर हरियाली तथा ताजगी का वातावरण दिखाई देता है।

ठीक इसी प्रकार मनुष्य का बाल्यकाल होता है। बच्चे निष्छल, भोले और मनमोहक होते हैं। उनकी मुस्कान, चंचलता और मासूमियत सभी को आकर्षित करती है। यह अवस्था पवित्रता, स्नेह और निश्छल आनंद की प्रतीक होती है।

दूसरी अवस्था 

यौवन — तेजस्वी सूर्य की भाँति

ज्यों-ज्यों सूर्य ऊपर उठता है, उसका ताप और तेज बढ़ने लगता है। उसकी चमक तीव्र हो जाती है और पक्षी भी अपने घोंसलों में विश्राम करने लगते हैं।

इसी प्रकार मनुष्य का यौवनकाल होता है। इस अवस्था में व्यक्ति ऊँचाइयों को छूना चाहता है। उसके भीतर सपनों, आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं का ज्वार होता है। कई बार वह अपने उत्साह, आवेश और आवेग में दूसरों की बात सुनना भी नहीं चाहता। यह संघर्ष, कर्म और आत्मनिर्माण की अवस्था है।

तीसरी अवस्था 

वृद्धावस्था — ढलते सूर्य की भाँति

जब संध्या का समय आता है, तब सूर्य का प्रकाश धीरे-धीरे मंद होने लगता है। उसका तेज कम होने लगता है और वह क्षितिज की ओर ढलने लगता है।

यही मनुष्य की वृद्धावस्था है। शरीर की शक्ति क्षीण होने लगती है, गति धीमी पड़ जाती है और व्यक्ति कभी-कभी अपने बीते बचपन और यौवन को स्मरण कर भावुक हो उठता है। यदि इस अवस्था को केवल दुःख और हताशा के रूप में देखा जाए, तो जीवन बोझिल लगने लगता है।

परंतु सत्य यह है कि यह अवस्था भी जीवन का स्वाभाविक और आवश्यक पड़ाव है। इसे सकारात्मक सोच के साथ जीना चाहिए। जिन इच्छाओं को समयाभाव के कारण पूरा नहीं कर सके—जैसे पढ़ना-लिखना, मित्रों से मिलना, प्रकृति के बीच समय बिताना, बगीचे में घूमना या पोते-पोतियों तथा नाती-नातिनों के साथ खेलना—उन्हें अब पूरा किया जा सकता है।

भजन, कीर्तन, सत्संग और ईश्वर-चिंतन के साथ मन को शांत रखा जाए, तो वृद्धावस्था भी आनंदमय बन सकती है। यह समय शिकायत का नहीं, बल्कि अनुभवों की रोशनी बाँटने का होता है।

चौथी अवस्था 

जीवन का अंतिम पड़ाव — रात्रि की भाँति

अंततः रात्रि आती है और सूर्य का प्रकाश विलीन हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य जीवन की अंतिम अवस्था आती है, जब आत्मा परमात्मा में विलीन होने की ओर अग्रसर होती है।

यह सत्य है कि इस संसार में जो आया है, उसे एक दिन जाना अवश्य है। किंतु वास्तविक अर्थों में श्रेष्ठ जीवन वही है, जिसमें व्यक्ति शांत चित्त, निर्मल मन और ईश्वर-स्मरण के साथ अपने अंतिम समय का स्वागत करे।

उपसंहार

जीवन की चारों अवस्थाएँ—बाल्यकाल, यौवन, वृद्धावस्था और अंतकाल—प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। इनमें से कोई भी अवस्था स्थायी नहीं है। इसलिए प्रत्येक अवस्था को स्वीकारते हुए, उससे सीखते हुए और उसे पूर्णता के साथ जीना ही जीवन की सच्ची कला है।

निष्छल बचपन, ऊर्जावान यौवन, अनुभवी वृद्धावस्था और अंततः ईश्वर में समर्पण—यही मनुष्य जीवन का पूर्ण चक्र है। यदि हम इसे समझ लें, तो जीवन शिकायत नहीं, बल्कि कृतज्ञता का उत्सव बन सकता है।

हरिओम तत्सत।

प्रस्तोता

सुलोचना धनावत

स्थानीय संपादिका,
उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ,                                        नागपुर (महाराष्ट्र)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति








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