शब्दों की मर्यादा और संस्कारों की सुगंध
शब्दों की मर्यादा और संस्कारों की सुगंध
जब आचार्य निखिल जी महाराज कहते हैं—
“लफ्जों का इस्तेमाल हिफाजत से करिए, ये परवरिश का बेहतरीन सबूत होते हैं।”
तब यह केवल भाषा के संयम की शिक्षा नहीं होती, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व और संस्कारों का गहन दर्पण प्रस्तुत करने वाली चेतावनी होती है। उस समय उनकी मनःस्थिति अत्यंत सजग, संवेदनशील और समाज की गिरती संवाद संस्कृति को लेकर चिंतनशील प्रतीत होती है। वे केवल शब्दों की शक्ति नहीं देख रहे होते, बल्कि शब्दों के पीछे छिपे संस्कार, चेतना और मनुष्य के भीतर के चरित्र को पढ़ रहे होते हैं।
गुरुजी जैसे उस क्षण बहुत प्रेम से समझा रहे हों—“बंदे, तेरा परिचय केवल तेरे वस्त्र, पद या चेहरे से नहीं होता, तेरे मुख से निकले शब्द ही तेरे भीतर की मिट्टी का परिचय देते हैं। जैसे वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है, वैसे ही मनुष्य अपने शब्दों से।” उनकी चेतना उस समय अत्यंत करुणामयी होती है, क्योंकि वे जानते हैं कि आज मनुष्य ने संवाद करना तो सीखा है, लेकिन संवाद में संवेदना को बचाना भूलता जा रहा है।
वे यह अनुभव कर रहे होते हैं कि शब्द केवल ध्वनि नहीं हैं। वे ऊर्जा हैं। वे किसी टूटे हुए मन को जोड़ सकते हैं, और किसी भरे हुए हृदय को पलभर में तोड़ भी सकते हैं। इसलिए वे “हिफाजत” शब्द का प्रयोग करते हैं—क्योंकि शब्दों को संभालना वैसा ही है जैसे हाथों में जलता हुआ दीपक लेकर चलना। ज़रा-सी असावधानी अंधकार फैला सकती है।
एक दृष्टांत के रूप में गुरुजी शायद कहें—एक राजा ने अपने मंत्री से पूछा, “दुनिया की सबसे अच्छी चीज़ क्या है?” मंत्री ने कहा—“जीभ।” राजा ने फिर पूछा, “और सबसे बुरी?” मंत्री ने फिर उत्तर दिया—“जीभ।” राजा चकित हुआ। मंत्री बोला—“इसी से प्रेम जन्म लेता है, संबंध बनते हैं, टूटे मन संभलते हैं; और इसी से अपमान, युद्ध और दूरी भी पैदा होती है।” यही कारण है कि शब्दों का चुनाव व्यक्ति की परवरिश और भीतर की शिक्षा का सबसे सशक्त प्रमाण बन जाता है।
एक और दृष्टांत में वे कहते—एक कुम्हार दो घड़े बनाता है। दोनों एक ही मिट्टी से बने, लेकिन एक को वह स्नेह और धैर्य से आकार देता है, दूसरे को कठोरता से। पहला घड़ा सुंदर और मजबूत बनता है, दूसरा जल्दी टूट जाता है। मनुष्य भी ऐसा ही है। जिस घर में सम्मान और मधुर भाषा का वातावरण होता है, वहाँ के बच्चों के शब्दों में सहज विनम्रता आ जाती है। परवरिश की सबसे बड़ी पहचान डिग्री नहीं, व्यवहार बनता है।
आचार्य निखिल जी की उस अवस्था में चेतना अत्यंत संतुलित और शिक्षाप्रद होती है। वे किसी को दोष नहीं दे रहे होते, बल्कि एक आत्मिक संकेत दे रहे होते हैं कि बोलने से पहले शब्दों को हृदय की कसौटी पर अवश्य परखो। क्या यह शब्द किसी को सुकून देंगे? क्या यह किसी को चोट पहुँचाएँगे? क्योंकि शब्द लौटते नहीं—वे या तो दुआ बनकर बसते हैं, या घाव बनकर रह जाते हैं।
उनकी यह वाणी किसी उपदेश की कठोरता नहीं रखती, बल्कि एक अनुभवी गुरु के उस स्नेहिल स्पर्श जैसी लगती है, जो अपने शिष्य से कह रहा हो—“तुम्हारी परवरिश तुम्हारे कपड़ों से नहीं, तुम्हारे लफ्जों से पहचानी जाएगी। इसलिए बोलो, लेकिन ऐसे बोलो कि तुम्हारे शब्दों में तुम्हारे संस्कारों की खुशबू महसूस हो।”
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