“उम्मीद, विश्वास और आत्मीयता का अदृश्य सेतु”
“उम्मीद, विश्वास और आत्मीयता का अदृश्य सेतु”
यह कथन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों की गहराई में उतरने वाला एक आध्यात्मिक सत्य है। जब आचार्य निखिल जैसे संवेदनशील चिंतक ऐसा कहते हैं, तब प्रतीत होता है कि वे केवल व्यवहार की बात नहीं कर रहे, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे उस सूक्ष्म भावलोक को स्पर्श कर रहे हैं जहाँ संबंध अधिकार से नहीं, आत्मीयता से जीवित रहते हैं।
कल्पना कीजिए उस मनःस्थिति की, जिसमें यह विचार जन्मा होगा। संभवतः आचार्य जी ने जीवन में अनेक बार यह देखा होगा कि लोग अपेक्षाओं को बोझ समझ लेते हैं। कोई किसी से सहायता चाहता है तो सामने वाला यह मान बैठता है कि शायद यह व्यक्ति स्वार्थवश निकट आया है, या उसकी कोई मजबूरी है। किन्तु अनुभवी दृष्टा का मन सतह पर नहीं रुकता। वह भावों के स्रोत तक जाता है। आचार्य निखिल शायद उस क्षण मनुष्य के टूटते रिश्तों, घटती संवेदनाओं और बढ़ती आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति को देखकर भीतर से उद्वेलित हुए होंगे। उन्होंने अनुभव किया होगा कि जब कोई व्यक्ति अपने संघर्ष, अपने भय या अपने सपनों के बीच आपको याद करता है, तो वास्तव में वह आपकी क्षमता से अधिक आपके हृदय पर भरोसा कर रहा होता है।
गुरुजी शायद अपने शिष्यों से कहते—
“वत्स! संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु धन नहीं, विश्वास है। धन खोकर पाया जा सकता है, पर विश्वास टूट जाए तो संबंधों की जड़ें सूखने लगती हैं। जब कोई तुमसे उम्मीद रखता है, तो उसे अपनी कमजोरी मत समझ लेना। वह तुम्हें अपना मानता है, तभी तो तुम्हारी ओर देखता है। वृक्ष से वही पक्षी आश्रय चाहता है जिसे उसकी शाखाओं की स्थिरता पर भरोसा होता है। आकाश से कोई उम्मीद नहीं रखता, क्योंकि वह छूने में नहीं आता; पर वृक्ष से रखता है, क्योंकि वह निकट होता है।”
एक छोटा-सा दृष्टांत इस सत्य को और स्पष्ट करता है। एक वृद्ध माँ थी, जिसके तीन पुत्र थे। माँ को सबसे अधिक उम्मीद छोटे बेटे से थी। बड़े पुत्रों ने कई बार ताना मारा—“माँ, आप उसी से क्यों कहती रहती हो? क्या हम नहीं हैं?” माँ मुस्कराई और बोली—“तुम सब हो, पर उससे इसलिए कहती हूँ क्योंकि उसके चेहरे में मुझे अपनापन दिखता है। मुझे विश्वास है कि मेरी बात उसके मन तक पहुँचेगी।” यहाँ उम्मीद मजबूरी नहीं थी, बल्कि विश्वास की अभिव्यक्ति थी।
इसी प्रकार एक गाँव में एक गुरु के अनेक शिष्य थे। एक दिन गुरु ने पूछा—“यदि मैं कठिन परिस्थिति में पड़ जाऊँ तो कौन मेरा साथ देगा?” कई शिष्य चुप रहे, पर एक शिष्य तुरंत आगे आया। गुरु मुस्कुराए और बोले—“देखो, यही कारण है कि मैं सबसे अधिक इसी को कार्य सौंपता हूँ। अपेक्षा वहीं जन्म लेती है जहाँ भरोसा जीवित होता है।”
गुरुजी आगे कहते प्रतीत होते हैं—
“आज मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह हर अपेक्षा को बंधन मान बैठा है। उसे लगता है कि लोग उसे इस्तेमाल कर रहे हैं। परंतु स्मरण रखना, हर उम्मीद शोषण नहीं होती। कई बार यह किसी के मन का मौन निवेदन होती है—‘तुम मेरे अपने हो, इसलिए तुम्हें पुकार रहा हूँ।’ यदि कोई तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता है, तो समझना कि उसने संसार के हजारों द्वार छोड़कर तुम्हें चुना है। यह तुम्हारे व्यक्तित्व का सम्मान है, तुम्हारे अस्तित्व की स्वीकृति है।”
जीवन में जब हम इस भाव को समझने लगते हैं, तब शिकायतें कम होने लगती हैं। हमें यह एहसास होता है कि किसी का हम पर विश्वास करना वास्तव में ईश्वर द्वारा दिया गया एक दायित्व है। क्योंकि जहाँ उम्मीद होती है, वहाँ संबंध अभी जीवित होते हैं; जहाँ विश्वास बचा होता है, वहीं आत्मीयता का दीपक जलता है।
अतः जब अगली बार कोई आपसे आशा रखे, तो उसे बोझ समझकर तिरस्कृत न करें। ठहरकर यह अवश्य सोचें कि शायद संसार की भीड़ में उसने आपको इसलिए चुना है क्योंकि उसके मन में आपके लिए सम्मान, स्नेह और भरोसे की एक अदृश्य डोर अब भी सुरक्षित है। यही डोर रिश्तों को टिकाए रखती है, यही मनुष्यता का आधार है, और यही जीवन का सबसे सुंदर आध्यात्मिक सत्य भी।
सृजक
आचार्य निखिल जी महाराज
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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