“शांति को चुनने वाला ही जीवन का वास्तविक विजेता है”

 

“शांति को चुनने वाला ही जीवन का वास्तविक विजेता है”


जब आचार्य निखिल यह कहते हैं— 
“शांतिप्रिय लोग शांति सर्वोच्च प्राथमिकता पर होने के कारण आनंद से जीवन जीते हैं। उन पर हार या जीत का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।”
तब वे जीवन की उस दुर्लभ अवस्था का वर्णन कर रहे होते हैं, जहाँ मनुष्य का सुख बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता से जन्म लेता है। यह कथन किसी पराजय को स्वीकार करने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि यह बताता है कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य जीतना नहीं, बल्कि अपने भीतर की शांति को अक्षुण्ण बनाए रखना है।

उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत संतुलित, निर्विकार और आत्मानुभूति से परिपूर्ण प्रतीत होती है। वे जीवन को प्रतिस्पर्धा के मैदान की तरह नहीं, बल्कि चेतना के विकास की यात्रा की तरह देख रहे होते हैं। उन्होंने शायद अनुभव कर लिया है कि संसार में जीतने वाले भी बेचैन हैं और हारने वाले भी। इसलिए समस्या जीत या हार में नहीं, बल्कि उस मन में है जो अपनी शांति को परिणामों के हाथों गिरवी रख देता है।

गुरुजी जैसे अपने शिष्यों से प्रेमपूर्वक कह रहे हों— “यदि तुम्हारी प्रसन्नता केवल जीत पर निर्भर है, तो समझ लो कि हार तुम्हारा सुख छीन लेगी। लेकिन यदि तुम्हारी प्रसन्नता तुम्हारे भीतर की शांति पर आधारित है, तो जीत तुम्हें अहंकारी नहीं बनाएगी और हार तुम्हें तोड़ नहीं पाएगी।”

वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक विशाल पर्वत के चरणों में दो नदियाँ बहती थीं। पहली नदी हर समय दूसरी से आगे निकलने की होड़ में लगी रहती थी। वर्षा कम होती तो वह व्याकुल हो जाती, कहीं दूसरी आगे न निकल जाए। दूसरी नदी केवल बहना जानती थी। उसे न आगे निकलने की चिंता थी, न पीछे रह जाने का भय। अंततः दोनों समुद्र में जाकर मिल गईं। गुरुजी मुस्कुराकर कहते हैं— “समुद्र ने किसी से नहीं पूछा कि कौन पहले पहुँचा था। उसने केवल दोनों को अपने भीतर समा लिया। जीवन का अंतिम सत्य भी ऐसा ही है; वहाँ केवल तुम्हारे मन की निर्मलता देखी जाएगी, तुम्हारी प्रतियोगिताएँ नहीं।”

फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक राजा ने एक चित्रकार से कहा कि वह ‘शांति’ का चित्र बनाए। एक चित्रकार ने शांत झील, नीला आकाश और खिले हुए कमलों का चित्र बनाया। दूसरे चित्रकार ने ऊँचे पहाड़ों के बीच प्रचंड झरना बनाया, चारों ओर तूफ़ान था, लेकिन उसी झरने की चट्टान की दरार में एक छोटी-सी चिड़िया अपने घोंसले में निश्चिंत बैठी थी। राजा ने दूसरा चित्र चुना और कहा— “शांति का अर्थ शोर का अभाव नहीं, बल्कि शोर के बीच भी भीतर की निश्चिंतता है।” गुरुजी समझाते हैं— “जिसके भीतर शांति है, उसके लिए हार और जीत केवल घटनाएँ हैं; वे उसके अस्तित्व को नहीं बदल सकतीं।”

आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस अनुभूति से भरी होती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपनी शांति को उपलब्धियों के साथ बाँध देता है। परीक्षा में सफल हुआ तो प्रसन्न, असफल हुआ तो टूट गया। व्यापार चला तो मुस्कान, घाटा हुआ तो जीवन निरर्थक लगने लगा। गुरुजी इस भ्रम को तोड़ते हुए कहते प्रतीत होते हैं कि जो सुख परिणामों पर टिका है, वह स्थायी नहीं हो सकता।

उनकी वाणी में करुणा इसलिए है कि वे मनुष्य की इस अनवरत दौड़ को देख रहे हैं, जिसमें लोग सफलता की सीढ़ियाँ तो चढ़ रहे हैं, लेकिन भीतर से खाली होते जा रहे हैं। वे चाहते हैं कि मनुष्य उपलब्धियाँ अर्जित करे, लक्ष्य भी बनाए, परंतु अपनी शांति को उन लक्ष्यों का बंधक न बनाए। क्योंकि शांति खोकर मिली हुई जीत भी अंततः पराजय ही है, और शांति बचाकर मिली हुई हार भी आत्मविजय बन जाती है।

वे अंत में मानो यही कह रहे हों— “जीवन में कर्म पूरे समर्पण से करो, श्रेष्ठ बनने का प्रयास करो, विजय मिले तो विनम्र रहो, पराजय मिले तो धैर्य रखो; पर हर परिस्थिति में अपने भीतर के शांत सरोवर को विचलित मत होने दो। क्योंकि संसार तुम्हें विजेता कहे या पराजित, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हारा अंतर्मन तुम्हें शांत, संतुष्ट और प्रसन्न कह सके। वही मनुष्य वास्तव में आनंदमय जीवन जीता है, जिसने जीत और हार दोनों से ऊपर उठकर शांति को अपना सबसे बड़ा पुरस्कार बना लिया है।”

वक्ता








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