विचार से स्वभाव, स्वभाव से कर्म और कर्म से भाग्य का निर्माण
विचार से स्वभाव, स्वभाव से कर्म और कर्म से भाग्य का निर्माण
जब आचार्य निखिल यह कहते हैं—
“एक विचार को यदि बार-बार पोषित किया जाए, तो वह धीरे-धीरे तुम्हारे चित्त का स्वभाव बन जाता है। और! स्वभाव कर्मों को जन्म देता है, तथा कर्म जीवन की दिशा तय करते हैं।”
तब वे केवल विचारों की शक्ति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि मानव जीवन के निर्माण का वह सूक्ष्म विज्ञान उद्घाटित कर रहे होते हैं, जिसे ऋषियों ने युगों पहले समझा था। उनका यह कथन मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि भाग्य कहीं बाहर नहीं लिखा जाता; उसका प्रारंभ तो एक छोटे-से विचार से ही होता है।
उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत गहन, आत्मदर्शी और जाग्रत प्रतीत होती है। वे मनुष्य के बाहरी आचरण को नहीं, उसके भीतर चल रहे विचारों के मौन प्रवाह को देख रहे होते हैं। वे जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति अचानक क्रोधी, करुणामय, लोभी, उदार, साहसी या भयभीत नहीं बनता। इन सबका जन्म किसी एक विचार से होता है, जिसे उसने बार-बार अपने भीतर स्थान दिया। वही विचार धीरे-धीरे उसकी चेतना की मिट्टी में जड़ें जमा लेता है और फिर उसका स्वभाव बन जाता है।
गुरुजी जैसे अपने शिष्यों से कह रहे हों— “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथों से पहले तुम्हारे विचारों में बनता है। इसलिए अपने मन में किस विचार को अतिथि बनाकर रख रहे हो, इसका ध्यान रखना। क्योंकि आज का अतिथि, कल तुम्हारे घर का स्थायी सदस्य बन सकता है।”
वे संभवतः एक दृष्टांत सुनाएँ। एक किसान के पास दो प्रकार के बीज थे। एक सुगंधित पुष्पों के और दूसरे काँटेदार झाड़ियों के। प्रतिदिन वह जिस बीज को पानी देता, वही तेजी से बढ़ता। कुछ महीनों बाद पूरा खेत उसी से भर गया। तब गाँव के एक वृद्ध ने कहा— “खेत ने कोई पक्षपात नहीं किया, उसने वही लौटाया जिसे तुमने पोषित किया।” गुरुजी मुस्कुराकर कहते— “चित्त भी ऐसा ही खेत है। यदि उसमें ईर्ष्या, भय और क्रोध के बीजों को सींचोगे तो वही स्वभाव बनेंगे; यदि प्रेम, धैर्य और करुणा के बीजों को पोषित करोगे तो वही जीवन की सुगंध बन जाएँगे।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक मूर्तिकार प्रतिदिन एक विशाल पत्थर पर केवल कुछ ही चोटें करता था। देखने वालों को लगता था कि इन थोड़ी-सी चोटों से क्या बदलने वाला है। पर महीनों बाद वही पत्थर एक अद्भुत प्रतिमा बन गया। गुरुजी समझाते हैं— “हर विचार हथौड़े की एक चोट है। एक विचार से कुछ नहीं बदलता, पर वही विचार जब प्रतिदिन दोहराया जाता है, तो वह तुम्हारे व्यक्तित्व की प्रतिमा गढ़ देता है।”
आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस गहरे अनुभव से भरी होती है कि मनुष्य अक्सर अपने कर्मों को बदलना चाहता है, जबकि उसके विचार वही बने रहते हैं। वह चाहता है कि जीवन बदल जाए, पर सोच नहीं बदलता। गुरुजी इसी भ्रम को तोड़ते हैं। वे समझाते हैं कि यदि जड़ स्वस्थ नहीं होगी तो शाखाएँ भी स्वस्थ नहीं हो सकतीं। विचार जड़ हैं, स्वभाव तना है, कर्म शाखाएँ हैं और जीवन का परिणाम उसका फल है। फल बदलने की इच्छा रखने से पहले जड़ों को बदलना आवश्यक है।
उनकी वाणी में करुणा इसलिए है कि वे जानते हैं, बहुत-से लोग अपने ही नकारात्मक विचारों के कैदी बन चुके हैं। वे बार-बार स्वयं से कहते हैं— “मैं असफल हूँ… मैं कमजोर हूँ… मुझसे नहीं होगा…” और धीरे-धीरे यही विचार उनका स्वभाव बन जाते हैं। फिर वही स्वभाव उनके कर्मों में झलकता है और अंततः वही उनके जीवन की दिशा निर्धारित कर देता है। गुरुजी चाहते हैं कि मनुष्य इस अदृश्य प्रक्रिया को पहचान ले और समय रहते अपने भीतर के विचारों की खेती बदल दे।
वे यह भी संकेत देते हैं कि संसार को बदलने से पहले अपने मन को बदलना आवश्यक है। क्योंकि जो भीतर चलता है, वही बाहर घटित होता है। मन यदि शांत है तो परिस्थितियाँ भी सहज प्रतीत होती हैं; मन यदि अशांत है तो सुख के बीच भी दुःख दिखाई देता है।
अंततः आचार्य निखिल मानो यही कह रहे हों— “अपने विचारों की रक्षा उसी प्रकार करो जैसे कोई माली अपने सबसे दुर्लभ पौधों की करता है। क्योंकि विचार केवल क्षणिक कल्पनाएँ नहीं हैं; वे तुम्हारे चरित्र के शिल्पकार हैं। आज जो विचार तुम प्रेम से सींच रहे हो, वही कल तुम्हारा स्वभाव बनेंगे; स्वभाव तुम्हारे कर्मों को जन्म देगा और कर्म तुम्हारे जीवन की दिशा तय करेंगे। इसलिए यदि जीवन को बदलना है, तो शुरुआत परिस्थितियों से नहीं, अपने विचारों से करो। वहीं से परिवर्तन की पहली किरण जन्म लेती है, वहीं से भाग्य की नई यात्रा प्रारंभ होती है।”

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