“पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है”

 “पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है”

जब आचार्य निखिल यह कहते हैं—

 “उत्तम मनुष्य वही जो भाग्य का नहीं, बल्कि सर्वदा प्रयत्न और पुरुषार्थ का ही आलंबन ले।” 

तब वे केवल परिश्रम का महत्व नहीं बता रहे होते, बल्कि मनुष्य को उसकी सुप्त शक्ति का बोध करा रहे होते हैं। उनका यह कथन भाग्य का निषेध नहीं करता, बल्कि भाग्यवाद का निषेध करता है। वे यह समझाना चाहते हैं कि भाग्य प्रतीक्षा करने वालों का सहारा हो सकता है, किंतु इतिहास रचने वालों का आधार सदैव पुरुषार्थ ही होता है।

उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत ओजस्वी, प्रेरणादायी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतीत होती है। वे ऐसे मनुष्य को देख रहे होते हैं जो अपनी असफलताओं का कारण ग्रहों, परिस्थितियों और भाग्य को मानकर स्वयं को कर्म से विमुख कर लेता है। गुरुजी का हृदय ऐसी मानसिकता को देखकर व्यथित भी होता है और करुणा से भर भी उठता है। वे मनुष्य को उसकी वास्तविक सामर्थ्य का स्मरण कराना चाहते हैं। उनकी वाणी में एक गुरु का स्नेह भी है और एक योद्धा का आह्वान भी।

मानो वे अपने शिष्यों से कह रहे हों— “भाग्य तुम्हारे हाथों की रेखाओं में नहीं, तुम्हारे हाथों के कर्मों में लिखा जाता है। जो व्यक्ति केवल भाग्य की प्रतीक्षा करता है, वह समय खो देता है; और जो पुरुषार्थ करता है, समय भी उसी के पक्ष में खड़ा हो जाता है। ईश्वर ने तुम्हें कर्म करने की शक्ति दी है, इसलिए कर्म को छोड़कर भाग्य की चर्चा करना स्वयं उस वरदान का अपमान है।”

दृष्टांत

वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। दो किसान थे। वर्षा का समय आने वाला था। पहला किसान प्रतिदिन खेत जोतता, बीज चुनता और मेड़ों को ठीक करता। दूसरा किसान केवल इतना कहता— “यदि भाग्य में होगा तो फसल अपने आप उग जाएगी।” कुछ दिनों बाद वर्षा हुई। पहले किसान के खेत लहलहा उठे, जबकि दूसरे के खेत में केवल घास उगी। तब गाँव के एक वृद्ध ने कहा— “वर्षा दोनों पर समान हुई, अंतर केवल पुरुषार्थ का था।” गुरुजी मुस्कुराकर कहते हैं— “प्रकृति अवसर सबको देती है, पर फल उसी को मिलता है जो अवसर को कर्म में बदल देता है।”

फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक शिल्पकार के सामने एक विशाल पत्थर रखा था। राहगीर हँसते हुए कहते— “इस पत्थर से क्या बनेगा?” शिल्पकार प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी छेनी चलाता रहा। महीनों बाद उसी पत्थर से एक दिव्य प्रतिमा प्रकट हुई। लोगों ने उसकी प्रशंसा की। शिल्पकार ने विनम्रता से कहा— “प्रतिमा पहले से ही पत्थर में थी, मैंने केवल निरंतर पुरुषार्थ किया।” गुरुजी समझाते हैं— “हर मनुष्य के भीतर भी एक दिव्यता छिपी है। उसे प्रकट करने का कार्य भाग्य नहीं, पुरुषार्थ करता है।”

आचार्य निखिल की चेतना उस समय इस सत्य से प्रकाशित होती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य नहीं, बल्कि भाग्यवाद है। आलसी व्यक्ति कभी-कभी प्रेरित होकर उठ भी सकता है, किंतु जो भाग्य के भरोसे बैठ गया, वह अपने प्रयासों को ही व्यर्थ समझने लगता है। गुरुजी इसी मानसिक बंधन को तोड़ना चाहते हैं। वे बताते हैं कि पुरुषार्थ केवल बाहरी श्रम नहीं, बल्कि मन की दृढ़ता, संकल्प की निरंतरता और लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा का नाम है।

उनकी वाणी में यह भी स्पष्ट झलकता है कि वे सफलता को केवल परिणामों से नहीं जोड़ते। उनके लिए सच्चा पुरुषार्थ वह है जिसमें व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ दे देता है। परिणाम चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल, उसका आत्मसम्मान सुरक्षित रहता है क्योंकि उसने अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया। ऐसा मनुष्य हारकर भी पराजित नहीं होता, क्योंकि उसके भीतर का पुरुषार्थ जीवित रहता है।

वे आगे मानो यह भी कह रहे हों— “यदि बीज यह सोचकर अंकुरित होने से इंकार कर दे कि पता नहीं वृक्ष बन पाऊँगा या नहीं, तो वह कभी वृक्ष नहीं बन सकेगा। प्रकृति का नियम है—पहले प्रयास, फिर परिणाम। पहले कर्म, फिर कृपा। पहले पुरुषार्थ, फिर भाग्य।”

अंततः आचार्य निखिल का यह संदेश मनुष्य को आत्मनिर्भरता, साहस और कर्मयोग की ओर ले जाता है। वे मानो कह रहे हों— “अपने जीवन की बागडोर परिस्थितियों या भाग्य के हाथों में मत सौंपो। अपनी चेतना को इतना जाग्रत करो कि तुम्हारा प्रत्येक प्रयास तुम्हारे भाग्य का नया अध्याय लिखने लगे। क्योंकि उत्तम मनुष्य वह नहीं जो अनुकूल भाग्य की प्रतीक्षा करता रहे, बल्कि वह है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पुरुषार्थ का दीपक जलाए रखता है। वही दीपक अंततः उसके मार्ग को प्रकाशित करता है और वही पुरुषार्थ उसके भाग्य का वास्तविक निर्माता बन जाता है।”

वक्ता

 
आचार्य निखिल जी महाराज
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








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