अंतरंग संपदा का अमर सत्य
अंतरंग संपदा का अमर सत्य
प्रिय आत्मजनों! संसार में मनुष्य प्रायः उस वस्तु को सबसे अधिक मूल्यवान मानता है जो उसकी आँखों से दिखाई देती है—धन, वैभव, प्रतिष्ठा, भवन, भूमि, आभूषण या बाहरी उपलब्धियाँ। किंतु मैं तुमसे कहता हूँ कि जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि हम बाहर की संपत्ति को अपनी वास्तविक शक्ति समझ बैठते हैं। बाहर की संपत्ति केवल सुविधा देती है, सुरक्षा का आभास देती है, किंतु मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी अंतरंग गुणवत्ता, उसका विवेक, उसका चरित्र, उसकी क्षमता और उसका आत्मबल होता है। यही कारण है कि मैंने कहा—“बाहर की संपत्ति कोई भी लूट सकता है, लेकिन हमारी अंतरंग गुणवत्ता और क्षमता को कोई छीन नहीं सकता।”
जब यह वाक्य मेरे भीतर जन्मा होगा, तब मन केवल समाज की घटनाओं को देखकर नहीं बोल रहा था, बल्कि मानव जीवन की गहरी विडंबना को अनुभव कर रहा था। संभवतः मनुष्य को संघर्ष करते हुए, परिस्थितियों से टूटते हुए, या धन के अभाव में स्वयं को असहाय मानते हुए देखकर भीतर करुणा जागी होगी। यह कथन किसी उपदेश की कठोरता से नहीं, बल्कि एक ऐसे गुरु के अंतर्मन से निकला प्रतीत होता है जिसने जीवन की आँधियों को निकट से देखा है और जाना है कि बाहरी हानि मनुष्य को उतना नहीं तोड़ती, जितना अपनी आंतरिक शक्ति को भूल जाना तोड़ देता है। उस क्षण मनःस्थिति अत्यंत गंभीर, अनुभूतिपूर्ण और आत्मिक रही होगी—एक ऐसी चेतना, जो शिष्य को उसके भीतर छिपे खजाने का स्मरण कराना चाहती है।
वत्स! विचार करो—यदि किसी वृक्ष के फल कोई तोड़ ले, उसकी शाखाएँ काट दी जाएँ, तब भी यदि उसकी जड़ें सुरक्षित हैं तो वह पुनः हरा-भरा हो सकता है। किंतु यदि जड़ ही नष्ट हो जाए, तब वृक्ष का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार धन, पद, प्रतिष्ठा, संबंध—ये सब वृक्ष के पत्ते और फल हैं। इन्हें समय, परिस्थिति या दुर्भाग्य छीन सकता है। लेकिन तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा आत्मविश्वास, तुम्हारी सद्गुणयुक्त चेतना और कर्म करने की क्षमता—ये तुम्हारी जड़ें हैं। इन्हें कोई बाहरी शक्ति छीन नहीं सकती, जब तक तुम स्वयं इन्हें न छोड़ दो।
एक दृष्टांत सुनो। एक नगर में दो व्यापारी रहते थे। दोनों अत्यंत समृद्ध थे। एक दिन भयंकर अग्निकांड हुआ और दोनों का व्यापार जलकर नष्ट हो गया। पहला व्यापारी रोने लगा—“मैं समाप्त हो गया, मेरा सब कुछ चला गया।” वह निराशा में डूबता गया क्योंकि उसने धन को ही अपनी पहचान मान लिया था। दूसरा व्यापारी शांत रहा। उसने कहा—“अग्नि ने मेरा सामान जलाया है, मेरे अनुभव को नहीं; उसने मेरे भवन को छीना है, मेरी बुद्धि को नहीं।” कुछ वर्षों बाद वही व्यक्ति फिर से सफल हो गया। लोगों ने पूछा—“तुमने यह कैसे किया?” उसने उत्तर दिया—“जो भीतर था, वही मुझे फिर से खड़ा कर गया।” यही अंतरंग गुणवत्ता का सामर्थ्य है।
एक और प्रसंग स्मरण करो। जब पांडवों को राज्य से वंचित कर वनवास दिया गया, तब उनके पास बाहरी वैभव नहीं था। राजमहल छिन गया, सत्ता चली गई, सम्मान को चुनौती मिली। किंतु उनका साहस, धर्मनिष्ठा, नीति और आत्मबल उनसे कोई नहीं छीन सका। यही कारण है कि समय ने उन्हें पुनः प्रतिष्ठित किया। दूसरी ओर कौरवों के पास अपार बाहरी संपत्ति थी, पर भीतर का विवेक दुर्बल था; परिणामतः सब कुछ होते हुए भी वे हार गए। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य की विजय बाहरी साधनों से नहीं, उसकी अंतरंग गुणवत्ता से होती है।
प्रिय जनों! जीवन में ऐसे अवसर आएँगे जब परिस्थितियाँ तुम्हारी परीक्षा लेंगी। कभी धन कम होगा, कभी लोग साथ छोड़ देंगे, कभी असफलता तुम्हारे द्वार पर दस्तक देगी। उन क्षणों में अपने भीतर झाँकना। स्वयं से कहना—“मुझसे मेरी वस्तुएँ छीनी जा सकती हैं, पर मेरा अनुभव नहीं; मेरी परिस्थिति बदल सकती है, पर मेरी क्षमता नहीं; मेरा बाहरी संसार डगमगा सकता है, पर मेरा आत्मविश्वास अडिग रह सकता है।”
मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी उसका चरित्र है, सबसे बड़ा धन उसका ज्ञान है, सबसे बड़ी शक्ति उसका धैर्य है और सबसे बड़ी सुरक्षा उसका आत्मबल है। यदि ये सुरक्षित हैं तो समझो तुम कभी निर्धन नहीं हो सकते। संसार की लूट केवल बाहर तक सीमित है; भीतर के प्रकाश तक कोई पहुँच नहीं सकता। इसलिए अपने बाहरी संग्रह से अधिक अपनी अंतरंग संपदा को समृद्ध करो। ज्ञान अर्जित करो, संस्कारों को पुष्ट करो, आत्मविश्वास को जगाओ, करुणा और धैर्य को अपना साथी बनाओ। क्योंकि जब जीवन की हर वस्तु छूट जाती है, तब अंततः मनुष्य को बचाता वही है जो उसके भीतर जीवित रहता है।
याद रखो—सोना चोरी हो सकता है, पर स्वर्णिम व्यक्तित्व नहीं; भवन गिर सकते हैं, पर दृढ़ आत्मबल नहीं; संसार तुम्हारे हाथ खाली कर सकता है, किंतु यदि हृदय गुणों से भरा है तो तुम कभी रिक्त नहीं हो सकते। यही जीवन का शाश्वत सत्य है, यही आत्मिक समृद्धि का रहस्य है।
वक्ता
आचार्य निखिल जी महाराज






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