“स्वास्थ्य और व्याधि का प्रथम निर्माता स्वयं मनुष्य है”
“स्वास्थ्य और व्याधि का प्रथम निर्माता स्वयं मनुष्य है”
जब आचार्य निखिल यह कहते हैं— “सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य और व्याधि का रचयिता स्वयं है। अतः खुद के प्रति सतर्क और सावधान रहे।” — तब वे केवल शरीर की देखभाल का संदेश नहीं दे रहे होते, बल्कि जीवन के उस व्यापक सत्य को उद्घाटित कर रहे होते हैं जिसमें मन, शरीर, आहार, विचार, व्यवहार और दिनचर्या—सभी एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं। उनका यह कथन दोषारोपण नहीं, बल्कि आत्मजागरण का निमंत्रण है। वे मनुष्य को यह स्मरण कराते हैं कि स्वास्थ्य केवल औषधियों से नहीं, बल्कि प्रतिदिन किए गए छोटे-छोटे निर्णयों से निर्मित होता है।
उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत करुणामयी, चिंतनशील और जागरूक प्रतीत होती है। वे संभवतः आधुनिक जीवन की उस विडंबना को देख रहे होते हैं जहाँ मनुष्य सुविधा तो चाहता है, पर अनुशासन नहीं; स्वाद चाहता है, पर संयम नहीं; सफलता चाहता है, पर विश्राम और संतुलन का महत्व भूल जाता है। वे अनुभव कर रहे होते हैं कि अधिकांश व्याधियाँ अचानक नहीं आतीं, बल्कि हमारी उपेक्षाओं की लंबी श्रृंखला का परिणाम बनकर सामने आती हैं। इसलिए वे चेतावनी नहीं, बल्कि आत्म-जिम्मेदारी का संदेश दे रहे होते हैं।
गुरुजी मानो अपने शिष्यों से कह रहे हों— “ईश्वर ने तुम्हें शरीर एक मंदिर की तरह सौंपा है। उसकी रक्षा का उत्तरदायित्व भी तुम्हारा ही है। यदि तुम प्रतिदिन उसमें अशुद्ध विचार, असंतुलित भोजन, अनियमित जीवन और तनाव भरते रहोगे, तो फिर केवल भाग्य या भगवान को दोष देना उचित नहीं होगा। प्रकृति का नियम बड़ा सरल है—जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे।”
वे एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक व्यक्ति के पास अत्यंत सुंदर बगीचा था। प्रारंभ में वह प्रतिदिन पौधों को पानी देता, खरपतवार हटाता और उनकी देखभाल करता था। धीरे-धीरे उसने लापरवाही शुरू कर दी। कुछ ही महीनों में वही बगीचा काँटों और सूखे पत्तों से भर गया। तब उसने माली से पूछा— “मेरा बगीचा ऐसा क्यों हो गया?” माली मुस्कुराकर बोला— “बगीचे ने तुम्हारे साथ अन्याय नहीं किया, उसने केवल तुम्हारी देखभाल का प्रतिबिंब दिखाया है।” गुरुजी समझाते हैं— “हमारा शरीर और मन भी ऐसा ही बगीचा है। उसकी दशा हमारे दैनिक व्यवहार का परिणाम होती है।”
फिर वे दूसरा दृष्टांत देते हैं। एक कुम्हार प्रतिदिन मिट्टी को सही मात्रा में पानी देता, धैर्य से गूँथता और सावधानी से आकार देता था। यदि वह थोड़ी भी लापरवाही करता, तो घड़ा पकने से पहले ही टूट जाता। वह जानता था कि अंतिम परिणाम उसी की सजगता पर निर्भर है। गुरुजी कहते हैं— “जीवन भी ऐसा ही घड़ा है। उसे स्वस्थ और मजबूत बनाने के लिए प्रतिदिन की सावधानी आवश्यक है। एक दिन का अनुशासन नहीं, बल्कि निरंतर जागरूकता ही स्वास्थ्य का आधार बनती है।”
आचार्य निखिल की चेतना उस समय केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं होती। वे मन के स्वास्थ्य की भी बात कर रहे होते हैं। वे जानते हैं कि क्रोध, ईर्ष्या, भय, चिंता और निरंतर तनाव भी ऐसी अदृश्य व्याधियाँ हैं जो शरीर को भीतर से खोखला कर देती हैं। दूसरी ओर, संतोष, प्रसन्नता, संयम, कृतज्ञता और सकारात्मक विचार शरीर को उतना ही पोषण देते हैं जितना उत्तम आहार।
वे यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि हर रोग मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होता। प्रकृति, आनुवंशिकता, दुर्घटनाएँ और अनेक परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जो हमारे वश में नहीं होतीं। किंतु वे यह अवश्य कह रहे हैं कि अपने जीवन की दिशा, अपनी आदतों और अपने व्यवहार के प्रति सजग रहना मनुष्य के हाथ में है। जितनी अधिक जागरूकता होगी, उतनी ही अधिक संभावना स्वस्थ और संतुलित जीवन की होगी।
उनकी वाणी में उस समय प्रेमपूर्ण आग्रह है, भय नहीं। वे चाहते हैं कि मनुष्य अपने शरीर को केवल भोग का साधन न माने, बल्कि साधना का माध्यम समझे। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही शांत मन का निवास सहज होता है और शांत मन में ही उच्च विचारों का उदय होता है।
अंततः आचार्य निखिल मानो यही कह रहे हों— “अपने शरीर के प्रति उतने ही सजग बनो जितने अपने धन, प्रतिष्ठा और संबंधों के प्रति रहते हो। क्योंकि यदि स्वास्थ्य चला गया, तो शेष उपलब्धियों का आनंद भी अधूरा रह जाएगा। प्रतिदिन का संयम, संतुलित आहार, शुद्ध विचार, नियमित दिनचर्या और प्रसन्न मन—यही वे बीज हैं जिनसे स्वास्थ्य का विशाल वृक्ष विकसित होता है। इसलिए स्वयं के प्रति सतर्क रहो, क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा चिकित्सक भी तुम्हारी सजगता है और सबसे बड़ा विनाशक भी तुम्हारी लापरवाही।”
वक्ता








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