“उपदेश से अधिक प्रभावशाली है आत्म-अनुशासन”
“उपदेश से अधिक प्रभावशाली है आत्मानुशासन” जब आचार्य निखिल यह कहते हैं— “जीवन में सफल होने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि हम उन सभी नसीहतों पर काम करना शुरू कर दें जो हम दूसरों को देते रहते हैं।” तब वे केवल एक व्यंग्यपूर्ण सत्य नहीं कह रहे होते, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विसंगति को अत्यंत सरल शब्दों में उजागर कर रहे होते हैं। यह कथन आत्मनिरीक्षण का दर्पण है। यह हमें दूसरों को बदलने की प्रवृत्ति से हटाकर स्वयं को बदलने की दिशा में ले जाता है। उस समय आचार्य निखिल की मनःस्थिति अत्यंत सजग, आत्मविश्लेषी और करुणामयी प्रतीत होती है। वे देख रहे होते हैं कि मनुष्य ज्ञान देने में तो उदार है, किंतु उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारने में अत्यंत कंजूस हो जाता है। लोग धैर्य का उपदेश देते हैं, पर स्वयं छोटी-सी बात पर क्रोधित हो जाते हैं। वे ईमानदारी की बातें करते हैं, पर सुविधा के अनुसार सिद्धांत बदल लेते हैं। वे प्रेम, क्षमा और विनम्रता की शिक्षा देते हैं, किंतु अपने व्यवहार में उन्हें स्थान नहीं देते। गुरुजी की करुणा इसी विरोधाभास को देखकर उमड़ती है। वे चाहते हैं कि मनुष्य...